60 प्रतिभागियों का विश्वविद्यालय दल वेस्ट जोन में करेगा प्रतिनिधित्व
अजमेर। विश्वविद्यालय में शैक्षणिक गतिविधियों के साथ-साथ सांस्कृतिक चेतना को सशक्त करने के उद्देश्य से अंतर-महाविद्यालय सांस्कृतिक प्रतियोगिता ‘दिग्नाद’ का भव्य शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर चार जिलों के 360 प्रतिभागी भाग ले रहे हैं जिनमें से चयनित होने पर विश्वविद्यालय से पूरे 60 प्रतिभागियों का कंटिजेंट आगामी वेस्ट जोन सांस्कृतिक महोत्सव (गुजरात) में विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करेंगे।
कार्यक्रम के प्रारंभ में अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो सुभाष चन्द्र ने बताया कि पूर्व वर्षों में प्रतिभागियों की सीमा 52 निर्धारित थी, जिससे अनेक प्रतिभाशाली विद्यार्थी अवसर से वंचित रह जाते थे। इस बार कुलगुरु के मार्गदर्शन में यह निर्णय लिया गया कि सभी योग्य विद्यार्थियों को समान अवसर प्रदान किया जाएगा, जिससे छात्रों में विशेष उत्साह और आत्मविश्वास देखने को मिल रहा है।
इस साल प्रतियोगिता को भारतीय विश्वविद्यालय संघ के निर्देशानुसार अधिक व्यापक स्वरूप दिया गया है। नृत्य श्रेणी में क्रिएटिव कोरियोग्राफी को पहली बार शामिल किया गया है, जिसमें सामाजिक मुद्दों, राष्ट्रहित एवं देशभक्ति से जुड़े विषयों को रचनात्मक अभिव्यक्ति दी जाएगी। कुल 27 प्रतियोगिताएं संगीत, नृत्य, साहित्य, रंगमंच एवं ललित कला की पाँच श्रेणियों में आगामी तीन दिनों तक आयोजित होंगी।
उद्घाटन समारोह के विशिष्ट अतिथि प्रख्यात गायक गोपाल सिंह खींची ने मांड गायकी से कार्यक्रम का शुभारंभ किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि कला, संगीत और संस्कृति ईश्वर प्रदत्त वरदान हैं और कलाकार को सदैव इस प्रतिभा के लिए कृतज्ञ रहना चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों को अपने पैशन को पहचानने और उसे जीवन का सकारात्मक आधार बनाने का संदेश दिया।
मुख्य अतिथि संभागीय आयुक्त शक्ति सिंह राठौड़ ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री अर्जन नहीं, बल्कि व्यक्ति का सर्वांगीण विकास होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अकादमिक जीवन के साथ-साथ सांस्कृतिक गतिविधियां विद्यार्थियों के व्यक्तित्व को परिपक्व बनाती हैं और जीवन को संतुलित एवं अर्थपूर्ण बनाती हैं। ऐसे आयोजन युवाओं को भविष्य के लिए आत्मविश्वास और दृष्टि प्रदान करते हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल के विचारों को साझा करते हुए कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल अकादमिक ज्ञान नहीं, बल्कि व्यक्ति का सर्वांगीण विकास है, जिसमें माइंड, बॉडी और सोल का संतुलित विकास आवश्यक है। ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रम इस उद्देश्य की पूर्ति करते हैं और विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने भारतीय परंपरा के नाद ब्रह्म सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि संगीत और कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सृष्टि और संस्कृति के मूल आधार हैं। भारतीय ही नहीं, पाश्चात्य सभ्यता में भी संगीत को सृजन का स्रोत माना गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कला मानव जीवन को आकार देने का सशक्त माध्यम है।
कुलगुरु ने गणित और संगीत के आपसी संबंध का उदाहरण देते हुए कहा कि हमारे पूर्वज अंतरविषयक दृष्टि (Interdisciplinary Approach) में विश्वास रखते थे और ज्ञान को अलग-अलग खानों में नहीं बांटते थे। ऐसे कार्यक्रमों का उद्देश्य सूचना या ज्ञान देना नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि विकसित करना है, जो साहित्य, संस्कृति और समाज को समझने में सहायक होती है।
उन्होंने रचनात्मक और आलोचनात्मक क्षमता (Creative & Critical Faculty) के विकास पर जोर देते हुए कहा कि इन्हीं गुणों के माध्यम से युवा जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। विकसित भारत की परिकल्पना भी कल्पनाशीलता, सशक्तीकरण और क्रियान्वयन की इसी यात्रा पर आधारित है। अंत में कुलगुरु ने प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय सभी के लिए अपना घर है और सभी व्यवस्थाएं विद्यार्थियों की सुविधा के लिए की गई हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि प्रतिभागी यहां से सकारात्मक स्मृतियां और प्रेरणा लेकर लौटेंगे।
विश्वविद्यालय के कुलसचिव ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों, शिक्षकों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों के प्रति आभार व्यक्त किया। साथ ही प्रतिभागियों को अपनी प्रतिभा के श्रेष्ठ प्रदर्शन हेतु प्रेरित करते हुए कहा गया कि साहित्य, संगीत और कला के माध्यम से ही मनुष्य का वास्तविक व्यक्तित्व निखरता है।
उदघाटन कार्यक्रम मे प्रो ऋतु माथुर, प्रो सुब्रतों दत्ता, प्रो शिव प्रसाद, प्रो मोनिका भटनागर, प्रो प्रवीण माथुर, वित्त नियंत्रक नेहा शर्मा, दिलीप शर्मा, डॉ लारा शर्मा सहित बड़ी संख्या मे अतिथि शिक्षक, प्रतिभागी छात्र छात्राएं उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन डॉ राजू लाल शर्मा ने किया।




