पीओके में भारी विरोध प्रदर्शनों के बीच 27 जुलाई से शुरू होंगे चुनाव, पीटीआई का बहिष्कार

0

इस्लामाबाद। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में 27 जुलाई से तीन चरणों में होने वाले विधानसभा चुनावों के पहले चरण की तैयारियां जारी हैं।

इस बीच राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनावी प्रक्रिया से महीनों से जारी अशांति के थमने या उन जन-समस्याओं के समाधान की उम्मीद बेहद कम है, जिनकी वजह से हजारों लोग सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए हैं। यह चुनाव इस क्षेत्र में हाल के वर्षों के सबसे बड़े आंदोलन के बीच आयोजित किए जा रहे हैं। प्रदर्शनकारी पाकिस्तानी प्रशासन पर आर्थिक उपेक्षा, राजनीतिक दमन और शासन में स्थानीय लोगों को उचित भागीदारी न देने का आरोप लगा रहे हैं।

‘द न्यूज इंटरनेशनल’ की रिपोर्ट के अनुसार चरणबद्ध तरीके से होने वाले यह चुनाव कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच संपन्न कराये जाने की संभावना है। पहले चरण का मतदान 27 जुलाई को होगा, इसके बाद दूसरे चरण का मतदान दो अगस्त को और अंतिम चरण का मतदान 10 अगस्त को आयोजित किया जाएगा।

अधिकारियों ने सुरक्षा चिंताओं और पूरे क्षेत्र में पर्याप्त सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की आवश्यकता का हवाला देते हुए चुनावों को चरणों में कराने की वजह बताई है। वर्तमान अशांति की शुरुआत रियायती गेहूं के आटे और बिजली की सस्ती दरों की मांगों को लेकर हुई थी।

स्थानीय निवासियों का तर्क है कि पीओके में पैदा होने वाली पनबिजली का लाभ सीधे यहां के लोगों को मिलना चाहिए। जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) के नेतृत्व में शुरू हुआ यह आंदोलन बाद में इस्लामाबाद की नीतियों के खिलाफ व्यापक अभियान में बदल गया, जिसमें प्रदर्शनकारियों ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व, शासन प्रणाली और आर्थिक अधिकारों के मुद्दे उठाए हैं।

जेएएसी को पिछले महीने पांच जून को प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया गया था। हाल के वर्षों में जेएएसी ने बिजली की ऊंची दरों, गेहूं की कीमतों और सरकारी विशेषाधिकारों के खिलाफ विरोध अभियानों की अगुवाई की थी, जिसके बाद उसने अपनी मांगों का दायरा बढ़ाकर राजनीतिक और प्रशासनिक सुधारों तक कर दिया। इस समूह ने क्षेत्रीय विधानसभा में शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को समाप्त करने की भी मांग की है।

सरकार का रुख है कि शरणार्थी सीटों को समाप्त करने के लिए औपचारिक संवैधानिक संशोधनों की आवश्यकता होगी।शरणार्थी सीटों पर विवाद सुलझाने के लिए पाकिस्तान की संघीय सरकार के साथ हुई वार्ता विफल होने के बाद जेएएसी ने नौ जून को पूरे पीओके में प्रदर्शन का आह्वान किया था। समूह का तर्क है कि ये आरक्षित सीटें पाकिस्तान की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों को पीओके में सरकार बनाने के दौरान हस्तक्षेप का अवसर देती हैं, इसलिए इन्हें तुरंत समाप्त किया जाना चाहिए।

सरकार ने इस अधिकार गठबंधन की संभावित हिंसा, हथियारों के अधिग्रहण, कानून प्रवर्तन कर्मियों पर हमलों और सामान्य जीवन बाधित करने की योजनाओं’ में कथित संलिप्तता की रिपोर्टों का हवाला देते हुए पांच जून को इस पर प्रतिबंध लगा दिया था। जेएएसी ने हालांकि इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि अधिकारों के लिए उसका संघर्ष पूरी तरह से शांतिपूर्ण है।

जेएएसी के इस अभियान को तब बड़ा झटका लगा जब पीओके के सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि आरक्षित सीटों को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है और इन्हें किसी कार्यकारी या प्रशासनिक आदेश के जरिये समाप्त नहीं किया जा सकता। जून में स्थिति उस समय अधिक गंभीर हो गई, जब प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़पें हिंसक हो गईं, जिसमें आम नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों दोनों की मौत हुई। चुनाव कार्यक्रम के बावजूद पीओके के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन जारी रहे और कुछ क्षेत्रों में आवाजाही तथा संचार सेवाओं पर प्रतिबंध लगाये जाने की रिपोर्टें सामने आईं।

53 सदस्यीय पीओके विधानसभा में 45 निर्वाचित सीटें और आठ मनोनीत सदस्य होते हैं। निर्वाचित सीटों में से 33 सीटें सीधे पीओके में हैं, जबकि 12 सीटें उन शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं, जो 1947 के बाद पाकिस्तान में बस गए थे। ‘द

न्यूज इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2021 के चुनावों में 26 सीटें जीतने वाली पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) ने जारी विरोध प्रदर्शनों के समर्थन में इन चुनावों के बहिष्कार का एलान कर दिया है। मुख्य विपक्षी दल की अनुपस्थिति के कारण विश्लेषकों ने मतदान प्रतिशत और पूरी चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। शरणार्थी सीटों का मुद्दा अब भी विवाद का सबसे मुख्य कारण बना हुआ है।

जेएएसी और अन्य स्थानीय समूहों का आरोप है कि यह व्यवस्था पाकिस्तान की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों को पीओके में सरकार बनाने की प्रक्रिया को प्रभावित करने का अनैतिक मौका देती है। लगातार जारी प्रदर्शनों, लागू प्रतिबंधों और कई मांगों के अनसुलझे रहने के कारण इस चुनाव परिणाम से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में व्याप्त तनाव के तुरंत समाप्त होने की उम्मीद बहुत कम है।