मातृभाषा मनुष्य जीवन की प्राण शक्ति है : विपिन चंद्र

पाली। अखिल भारतीय साहित्य परिषद जोधपुर प्रांत की ओर से सोमवार को आनलाइन मीट के जरिए संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें अपनी बोली अपना गांव विषय पर हिन्दी भाषा के मूर्धन्य विद्वानों ने विचार व्यक्त किए।

संगोष्ठी संयोजक पवन पाण्डेय ने बताया कि इसमें जोधपुर प्रांत के 50 साहित्यकारों ने भाग लिया। कवियत्री तृप्ति चतुर्वेदी पाण्डेय के परिषद गीत भारती की लोक मंगल साधना साकार हो से संगोष्ठी का आगाज हुआ। परिषद् के प्रदेश संगठन मंत्री विपिन चंद्र पाठक ने कहा मातृभाषा मनुष्य जीवन की प्राणशक्ति है, कोई भी बोली हो सभी की अपनी मातृभाषा होती है। इजराइल दो हजार साल के संघर्ष के बाद विश्व में अपनी बोली-भाषा की बदौलत सिरमौर बन चुका है वहाँ के लोग आदर्श बन रहे हैं। हमें भी अपने पूर्वजों की विरासत अपनी क्षेत्रीय बोली को बचाकर रखना होगा।

क्षेत्रीय अध्यक्ष डा.अन्नाराम शर्मा ने कहा अपने गांव और वहां के विशाल शब्द भंडार की सूक्ष्म जानकारी से ही राजस्थानी कविता की प्रामाणिकता आएगी। गांव आज भी संस्कृति के केन्द्र हैं वहां के लोक संस्कार, मेले, व्यंजन, लोकगीत प्रसिद्ध हैं। साहित्यकार को उनकी गहरी समझ होनी चाहिए। राजस्थानी भाषा में मिठास है उसका एक एक शब्द संस्कृति परंपरा का वाहक है।

जोधपुर प्रांत अध्यक्ष डाक्टर नरेन्द्र मिश्र ने कहा कि बोलियां कई प्रकार की हैं मगर राजस्थानी बोली में आत्मीयता का संस्कार झलकता है। हमें सांस्कृतिक रूप से समृद्ध होना है और शहरीकरण से क्षेत्र और क्षेत्र से गांव तक आना पड़ेगा। मेरी भाषा के लोग मेरी सड़क के लोग हैं, जिस प्रकार चिड़िया को दाना चुगने के लिए जमीन पर आना होता है उसी तरह हमें भी अपने देश को मजबूत करने के लिए स्थानीय होना पडेगा।

मुख्य वक्ता डाॅ. श्रीलाल सुथार सोजत ने कहा कि भाषा संस्कृति की वाहक होती है, राजस्थानी सहित सभी भारतीय भाषाओं के ह्वास के कारण हमारी सनातन संस्कृति को बहुत भारी हानि का सामना करना पड़ रहा है। भारत की संस्कृति को गांव की भाषा बचाए हुए हैं। सभी भारतीय भाषाओं को आज अंग्रेजी भाषा के अतिक्रमण से भारी हानि हो रही है। साहित्यकारों पर ही भाषा और संस्कृति को बचाने का गुरूतर दायित्व है।

डाक्टर विक्रम सिंह राजपुरोहित ने कहा मातृ भाषा को पुनः जीवित करना है और मूल भाषा का दिन प्रतिदिन उपयोग बढ़ाना है। जो अपनत्व अपनी बोली में मिलता है वह मिठास सम्मान कहीं भी नहीं है। बीज वक्तव्य देते हुए अरूणा गुलगुलिया खाजूवाला ने कहा कि साहित्य गांव की चौपालों से शहरों के बंद कमरे में चला गया है उसे वापस लाने की महती आवश्यकता है। बच्चों की प्राथमिक शिक्षा मातृ भाषा में ही होनी चाहिए जिससे बच्चे अपनी मातृभाषा मूल बोली अपने गांव से जुड़े रहें।

परमानंद भट्ट जालोर ने लालदास राकेश के दोहे सुनाते हुए कहा कि मां अर मायड़ भोम ज्यूं मायड़ भाषा मान राजस्थानी राखियां रहसी राजस्थान। दूसरे सत्र में साहित्यकार प्रमोद श्रीमाली पाली ने कहा कि राजस्थानी नई पीढ़ी तक पहुंच ही नहीं रही है। अपनी भाषा पर गर्व करना होगा और इसे नई पीढ़ी के संस्कारों में शामिल करना होगा।

साहित्यकार प्रेम प्रकाश पारीक बीकानेर ने कहा मूल भाषा को बोलने में भाषा का स्वरूप बदल जाता है, जैसे बार बार घिसने से पत्थर पर भी निशान बन जाते हैं ठीक उसी प्रकार मूल भाषा को बोलते बोलते उसमें कुछ अलंकृत शब्द जुड़ जाते हैं। दिलीप सिंह परमार सिरोही ने कहा कि सिरोही की स्थापना 1425 में महारावल सहस्त्रमल ने की थी। इसका अर्थ सिर काटने वाली तलवार। सिरोही की बोली को देवड़ावाटी कहते है। इसमें मारवाड़ी, गोडवाड़ी, मेवाड़ी, गुजराती भाषा के शब्दों का समावेश है। जैसे कठे अर्थात कहां, अठे अर्थात यहां, किकण अर्थात कैसे, वठे अर्थात वहां, कदी अर्थात कब इत्यादि।

विजय सिंह माली सादड़ी ने कहा कि हमें अपनी मातृ बोली व गांवों पर गर्व होना चाहिए। मातृ बोली व गांव संस्कृति और संस्कारों के संवाहक है। मां, मातृभूमि और मातृ भाषा का कोई विकल्प नहीं हो सकता। माली ने घर परिवार के साथ प्राथमिक स्तर तक मातृभाषा में पढ़ाई कराने, विद्यालय की प्रार्थना सभा में सप्ताह में एक दिन मातृभाषा का उपयोग करने व समाचार पत्र पत्रिकाओं में एक पृष्ठ मातृ भाषा में प्रकाशित करने जैसे उपयोगी सुझाव भी दिए।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि अमर चंद बोरड़, डा.हरिदास व्यास, डा.महेन्द्रसिंह राजपुरोहित, डा. मीनाक्षी बोराणा, कर्णसिंह बेनीबाल बीकानेर, डा. कामिनी ओझा, मूलचंद बोहरा बीकानेर, नीरज सिंह शेखावत सादुलशहर , अरुणा गुलगुलिया खाजूवाला, डाॅ गोरधन सिंह सोढ़ा बाडमेर, इला पारीक, डाॅ पूनाराम पटेल सिरोही, उम्मेद सिंह नागौर, बसंती हर्ष बीकानेर, नीलम पारीक बीकानेर, आशा शर्मा बीकानेर, लालाराम प्रजापत सहित कई साहित्यकारों ने अपने अपने विचार रखे। संगोष्ठी का संचालन डा. गोविन्द सिंह राजपुरोहित जोधपुर विश्वविद्यालय व साहित्यकार पवन पाण्डेय ने किया।