आषाढ़ मास के व्रत और त्यौहार तथा हिन्दू धर्म में महत्व

आषाढ़ माह के व्रत व त्यौहार
आषाढ़ माह के व्रत व त्यौहार

आषाढ़ मास | प्राचीन काल से ही धर्मग्रंथों में विज्ञान को आधार बनाकर एक ऐसी जीवन पद्धति विकास किया जो आज सभी मानते है और जिसके आधार पर काल (Time) की गणना आसानी से कर सकते हैं ।

नक्षत्रों के हिसाब से हिंदू पंचांग तैयार किया गया। हम देखते हैं कि सभी महीनों के नाम नक्षत्रों पर आधारित हैं। चूंकि हमारी गणनाएं चाँद की गति पर आधारित है इसलिए महीने की पूर्णिमा को चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है उस महीने का नाम उसी नक्षत्र के नाम पर रखा गया है।

हिंदू पंचांग के अनुसार चतुर्थ मास आषाढ़ होता है और इसका नाम पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा नक्षत्रों पर आधारित हैं क्योंकि आषाढ़ माह की पूर्णिमा को चंद्रमा इन्हीं नक्षत्रों में रहता है। जिस कारण इस महीने का नाम आषाढ़ पड़ा है । इसे बरसात का महीना भी कहा जाता है, क्योंकि उत्तर भारत को छोड़कर भारत के कुछ हिस्सों में काफ़ी वर्षा होनी शुरू हो जाती है।

केरल में मानसून सबसे पहले आता है और फिर वो तमिलनाडु की तरह होता हुआ बंगाल की खाड़ी में सक्रिय होता है। तमिलनाडु में इस महीने को आदि कहते हैं। वहां आदि अमावस्या का विशेष महत्व है।

व्रत एवं त्यौहार:-

यूं तो हम भारतीयों का संपूर्ण जीवन व्रत-त्यौहार से परिपूर्ण है लेकिन आषाढ़ मास, जो जुलाई के माह में आता है, में अनेक व्रत और त्यौहार आते हैं। जो हमारे जीवन में खास होते हैं। जैसा कि आप सभी जानते हैं कि हिंदू पंचांग कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में बँटा है इसलिए व्रत-त्यौहार भी दोनों पक्षों में अपनी विशेष अहमियत रखते हैं।

1.योगिनी एकादशी

आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहा जाता है। धर्म-शास्त्रो में इस दिन भगवान विष्णु की पूजा का विधान बताया गया हैं।

2. आषाढ़ अमावस्या-

यू तो सभी अमावस्या बहुत ही पवित्र मानी जाती है। नदी-स्नान, दान-पुण्य, पितृ कर्म यानि अपने पूर्वजों का याद करने के लिए ये सर्वोत्तम मानी जाती है। यही कारण है कि इस दिन दान पूण्य करना सर्वेश्रेष्ठ माना गया है।

3. गुप्त नवरात्रि-

चैत्र नवरात्रि और आश्विन नवरात्रि गृहस्थ जीवन के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रखने का पैगाम देती हैं तो दूसरी ओर दो गुप्त नवरात्रि में गुप्त तरीके से पूजा करने का विशेष महत्व है । हर वर्ष माघ माह एवं आषाढ़ माह में गुप्त नवरात्रि आती है।

4. जगन्नाथ यात्रा-

कृष्ण सर्वत्र हैं। ओडिशा राज्य की राजधानी भुवनेश्वर के पास पूरी शहर, जिसका पूरा नाम है- जगन्नाथपूरी में आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ की यात्रा निकाली जाती है। इसमें भगवान श्री कृष्ण, माता सुभद्राबलराम का पुष्य नक्षत्र में रथोत्सव निकाला जाता है । इस रथयात्रा में देश और विदेश के लाखों श्रद्धालु और पर्यटक सम्मिलित होते हैं।

5. देवशयनी एकादशी-

देवशयनी एकादशी एक विशेष एकादशी है। ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु इस दिन से चतुर्मास के लिये सो जाते हैं। ये सांकेतिक भाव है क्योंकि वर्षा ऋतु के चार महीने होते हैं और पुराने समय में आज जैसी आधुनिक सुविधाएं मौजूद नहीं थी। इस कारण बरसात के मौसम में कोई भी नया काम शुरू करना मुश्किल था। इसी वजह से इस एकादशी से सभी तरह के शुभ और मांगलिक कार्य, चतुर मास के लिए बंद कर दिए जाते हैं।

6. आषाढ़ पूर्णिमा-

आषाढ़ पूर्णिमा का दिन सबसे ख़ास दिन माना जाता हैं। इस दिन को गुरु पूर्णिमा को महापर्व के रूप मनाया जाता हैं । इस दिन गुरु की सेवा करना एवं शिक्षा/दीक्षा ग्रहण करने का विशेष महत्व है ।

दान पुण्य-

आषाढ़ मास में दान पुण्य का भी महत्व है क्योंकि भीषण गर्मी और बरसात शुरू होने से पहले ही खड़ाऊं, छाता, नमक तथा आंवले का दान किसी ब्राह्मण को करने के पीछे उनके जीवन को सुखमय और सुरक्षित करने का वैज्ञानिक महत्व माना जाता है।

उपासना-

इस मास में सूर्य और देवी की भी पूजा की जाती है। जेष्ठ मास में सूर्य के अत्याधिक ताप के कारण मनुष्य के जीवन को प्रभावित करता है। आषाढ़ मास में सूरज की गर्मी धीरे-धीरे कम होने से इस महीने में सूर्यदेव की पूजा अर्चना करनी चाहिए।

खानपान-

गर्मियों के मौसम में हमारा खानपान बिगड़ जाती है और आषाढ़ के महीने में खानपान का विशेष ध्यान रखने की जरूरत पूर्वजों ने बताई है। इस महीने में जलयुक्त फल खाने चाहिेए। बील या बील का रस बिलकुल भी नहीं लेना चाहिए क्योंकि ये हमारी पाचन क्रिया को नुक्सान पहुंचाता है। जहाँ तक हो सके तेल वाली चीज़ें कम खाएं । बारिश के मौसम में पेट को दुरुस्त रखें ।