अपना गुरुत्व बता चली आषाढी पूर्णिमा

सबगुरु न्यूज। ऋतुओं का श्रृंगार करतीं हुई प्रकृति जब बंसत ऋतु के रूप में होती है तो सबको अपनी ओर आकर्षित कर सभी को मिलन की धारा में बहा देती है जहां आत्मा और मन एक दूसरे में खो जाने के लिए आतुर हो जाते हैं और अक्षय तृतीया के अक्षय सम्बन्धों को बनाकर पीपल वृक्ष की तरह लगातार वृद्धि करने की कामना करते हुए बैसाखी पूर्णिमा को पुण्य कर अपने गर्म ओर सख्त मिजाजी जयेष्ठ के गर्म ओर अनुशासित वचनों को सहने की क्षमता बना कर मिल जाते हैं।

आत्मा और मन के मिलन में प्रकृति अपना रौद्र रूप धारण कर गर्म ऋतु का ऋंगार करती है और आत्मा तथा मन आपस में मिलते हुए एक दूसरे पर भारी पडने लगते हैं। मिलन के इस महासंग्राम में अति रौद्र रूप धारण कर प्रकृति आषाढ़ मास में अपना गुरुत्व दिखाती हुई जीव व जगत को झकझोर कर रख देती है।

आत्मा रूपी सूर्य को आर्द्रा नक्षत्र में ले जाकर मन रूपी ऋतु नायिका से मिलन करा कर दोनों को प्रकृति उस परम आनंद की ओर ले जाती है जहां आत्मा और मन का मिलन संग्राम खत्म हो जाता है और दोनों ही अपनी सुध बुध खो बैठते है ओर दोनों ही समर्पण कर अपने आप को भूल जाते हैं।

आर्द्रा नक्षत्र में करवट बदलती प्रकृति वर्षा ऋतु का ॠंगार करती है और बसंत रूपी नायिका को ऋतु स्नान करा जीव व जगत को गर्मी से राहत देती हुई जगत को जल से भर देती है और तपने से बरसने तक अपनी गुरूत्ता को आषाढ़ मास में सिद्ध कर गुरू रूप में सूर्य रूपी आत्मा का मन रूपी चन्द्रमा पर पूर्ण प्रकाश डालकर पूर्णिमा के दिन गुरू रूप में पूजी जाती है और बस यहीं से सूर्य रूपी आत्मा का रूख़ बदल देती है और सूर्य दक्षिण की ओर बढता हुआ दक्षिणायन हो जाता है।

संत जन कहते हैं कि हे मानव प्रकृति का यह आषाढ़ मास अपनी गुरूत्ता को बताता हुआ अत्यधिक गर्मी देकर अत्यधिक वर्षा करता है और इसी मास से प्रकृति करवट बदल सूर्य को दक्षिण की ओर ले जाती है। प्रकृति की यह तीनों ही घटनाक्रम आषाढ़ मास को पूर्ण चन्द्रमा के दिन गुरू रूप में पूजवा देती है।

इसलिए हे मानव कुछ विशेष व्यक्ति जो प्रकृति की तरह इन गुणों से ॠंगारित होता है और सभी विकट स्थितियों को विकटता से निकाल कर सहजता की ओर ले जाता है और जन कल्याण की ओर बढ जाता है वही गुरू रूप में पूजा जाता हैं। उसके कल्याण के पूर्ण प्रकाश को गुरू पूर्णिमा के रूप में पूजा जाता है।

गुरु पूर्णिमा पर गुरू रूप में पूजी जाकर प्रकृति जीव व जगत को मन भावन श्रावण मास की ओर ले जाती है और सभी आनंद के मेलों में रम जाते हैं। इसलिए हे मानव तेरी आत्मा ने गुरू पूर्णिमा पर मन को प्रकाशित कर दिया है, इसलिए अब मन पर उस सकारात्मक फसल को बो जहां सभी को आनंद की अनुभूति हो प्रेम भाईचारे की उन्नत फसल तैयार हो।

सौजन्य : भंवरलाल