जाति पांति को धणी भेद मिटायो

सबगुरु न्यूज। भक्ति, ज्ञान और कर्म ये विरासत में नहीं मिलतें, ना ही ये मान सम्मान की परिभाषा जानते हैं। इनका मकसद केवल समाज को सही दिशा निर्देश देना ही होता है। सामाजिक विषमता की खाईं को पाटने मे यह संतोष रूपी धन देकर मानव में प्रेम, सहयोग व समन्वय को बढाने के लिए सकारात्मक प्रेरणा का स्त्रोत बनते हैं।

सामाजिक व्यवस्था में जातिवाद छुआ-छूत कितना भी बढ़ गया, लेकिन चमत्कार आस्था और श्रद्धा के केन्द्र में इनका कोई भी अस्तित्व नजर नहीं आता है। धनाढय को राजधर्म के पालन की सीख दी तो गरीबों के मसीहा के रूप में उनका उत्थान किया।

जातिवाद ओर छुआ-छूत को मिटा उनके मानवीय मूल्यों व अधिकारो को जिन्दा रखा। इतिहास के इन्हीं पन्नो में बाबा रामदेव जी का नाम सदा अमर हो गया और लाखो लोगों ने इनके मार्ग का अनुसरण कर सामाजिक विषमता की खाईं को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आज भी यह जिन्दा है भले ही वर्तमान युग के व्यवहार सांप की तरह कितने भी बल खाने लग गया हो और अपने जहर का भय दिखा रहा हो।

राजस्थान की मरू भूमि के जैसलमेर जिले की पोकरण तहसील में अब से छह सौ साल पहले तंवर वंश के राजा हिन्दू राजा अजमल जी राज करते थे। उनके संतान नहीं होती थी। लोक कथाओं में वे द्वारका में श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए गए, वहां उन्हें पुत्र होने का वरदान मिला तथा श्रीकृष्ण के रूप में रामदेव जी के अवतार की बात कही ऐसा माना जाता है। बाद में ऐसा हो भी गया।

सायर मेघवंशी बाबा रामदेव जी के परम भक्त थे। एक दिन जब वे जंगल घूमने जा रहे थे तब एक बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। वहां देखा तो पेड़ पर बंधे पालने में एक बच्ची रो रही थी। बाबा रामदेव जी ने सायर मेघवंशी को बच्ची का लालन-पालन के लिए कहा। बाबा रामदेव जी उसे बहन मानते थे और उससे बहुत प्रेम करतें थे।

उस समय जातिवाद छुआ-छूत चरम सीमा पर चल रहा था। बाबा रामदेव जी इसके विरोधी थे और सभी छोटी कही जाने वाली जातियों को आदर सत्कार देते थे। समाज में व्यापत कुरीतियों का बाबा रामदेव जी ने अंत किया। इससे राज घराने के लोग नाराज थे, तब बाबा रामदेव जी ने पोकरण के पास गांव रामदेवरा बसाया और वही रहने लगे। थोडे दिन बाद उन्होंने जीवित समाधि लेने की घोषणा कर, खुदवाना शुरू कर दिया।

जैसे ही डाली बाईं को मालूम पडा वह तुरंत बाबा रामदेव जी के पास जाकर बोली पहले मैं समाधि लूंगी। दोनों में बहस छिड गई। डाली बोली हे बाबा ये समाधि खुदवा रहे हो यदि इसमें मेरे श्रृंगार का सामान निकला तो मैं ही पहले-पहल समाधि लूंगी और ऐसा ही हुआ।

समाधि जब पूरी ख़ुद गई तब उसमें श्रृंगार का सामान निकला और बाबा रामदेव जी देखते ही रह गए और डाली बाईं ने समाधि ले ली और इस दुनिया से विदा हो गईं। अपनी भक्त की ये आस्था देख बाबा रामदेव जी ने नवमी के तीन दिन बाद जीवित समाधि ले ली क्योंकि डाली बाईं ने समाधि नवमी के दिन ली।

आज भी बाबा रामदेव जी की समाधि के साथ साथ डाली बाईं की समाधि कों श्रद्धा और विश्वास के साथ पूजा जाता है। भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की दूज से दसमी तक रामदेव जी की समाधि के दर्शन करने हेतु सम्पूर्ण भारत सें पचास लाख से ज्यादा श्रदालु आते हैं। राम सा पीर की जय।

सौजन्य : ज्योतिषाचार्य भंवरलाल, जोगणियाधाम पुष्कर