कर्नाटक की राजनीति के मंझे हुए खिलाडी निकले बीएस येद्दियुरप्पा

बेंगलुरू। कर्नाटक की राजनीति में कद्दावर माने जाने वाले बीएस येद्दियुरप्पा ने तमाम अड़चनों और विरोधाभाषों के बावजूद तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली है।

मांडया जिले में के आर पेट तालुक अंतर्गत बूकानाकेरे में सत्ताइस फरवरी 1943 को जन्मे येद्दियुरप्पा की लोकप्रियता की एक बड़ी वजह उनका राज्य के किसानों का हितैषी होना भी है। येद्दियुरप्पा की आशावादिता और दृढ़ता का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि चुनावों से पहले ही उन्होंने कहा दिया था कि वह 17 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथग्रहण करेंगे। उनके रास्ते में कईं अड़चनें आई और बुधवार रात कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) द्वारा शीर्ष अदालत से हस्तक्षेप की मांग के बाद भी उन्हें अपने मुख्यमंत्री बनने पर भरोसा था।

हालिया विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की ओर मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार रहे येद्दियुरप्पा का एक समय भाजपा के प्रति बगावती रूख भी सामने आया था। 2008 में विधानसभा चुनाव में भाजपा 110 सीटों के साथ सबसे बड़ी एकल पार्टी के रूप में उभरी थी, लेकिन तीन सीटों के मामूली अंतर से बहुमत से पीछे रह गई थी। भाजपा ने हालांकि अपनी सरकार बनाई और येद्दियुरप्पा मुख्यमंत्री बने। इसी दौरान येद्दियुरप्पा के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की पृष्ठभूमि में भाजपा ने उन्हें दरकिनार कर दिया।

येद्दियुरप्पा ने भाजपा के इस कदम से कुपित होकर नई पार्टी का गठन किया जिसे कर्नाटक जनता पार्टी नाम दिया गया। 2013 के चुनाव में पासा पलटा और भाजपा 40 सीटों पर सिमट गई तथा येद्दियुरप्पा की पार्टी को महज छह सीटें मिली। कांग्रेस ने 122 सीटें जीती और पुन: सत्ता पर काबिज हुई।

कर्नाटक में क्षेत्रीय नेता से वंचित भाजपा ने येद्दियुरप्पा को घर वापसी के लिए राजी किया और गत विधानसभा चुनाव के दौरान उन्हें पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया। इसके बाद येद्दियुरप्पा ने राज्य में भाजपा के कुनबे को फिर से स्थापित करने के लिए जी-जान लगा दी और पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने के वास्ते विभिन्न यात्राओं का आयोजन किया।

येद्दियुरप्पा ने अपने कैरियर की शुरुआत समाज कल्याण विभाग में प्रथम श्रेणी लिपिक के रूप में की थी। बाद में वह सरकारी नौकरी छोड़कर शिकारीपुर चले गए, जहां उन्होंने हार्डवेयर दुकान शुरू करने से पहले कुछ समय तक एक राइस मिल के लिए भी काम किया।

येद्दियुरप्पा 1970 में आरएसएस के शिकारीपुर शाखा के कार्यदक्ष (सचिव) नियुक्त किए गए अौर यहीं से उनकी जनसेवा के काम की शुरूआत हुई। 1972 में वह शिकारीपुर नगरपालिका के सदस्य निर्वाचित हुए और जनसंघ के तालुक स्तर के अध्यक्ष भी नियुक्त किए गए।

1975 में वह शिकारीपुर नगरपालिका अध्यक्ष निर्वाचित हुए। उन्होंने आपातकाल के दौरान संघर्ष में हिस्सा लिया और बेल्लारी तथा शिमोगा जेल में बंद रहे। 1980 में वह भाजपा के शिकारीपुर तालुक इकाई के अध्यक्ष नियुक्त किए गए और पांच साल बाद भाजपा के शिमोगा जिला इकाई के अध्यक्ष बने।

इसके बाद येद्दियुरप्पा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और 1988 में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी को फिर से एक नई उर्जा प्रदान की। 1983 में पहली बार शिकारीपुर निर्वाचन क्षेत्र से विधायक बने येद्दियुरप्पा ने छह बार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया।

2013 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने यह सीट अपने पुत्र के लिए छोड़ दी। वह 1999 में वह चुनाव हार गए, लेकिन विधानपरिषद के लिए नामित किए गए और विपक्ष के नेता बने। 2004 में फिर चुनाव होने के बाद वह धरम सिंह के मुख्यमंत्रित्वकाल में विधानसभा में विपक्ष के नेता बने।

राजनीति के दांव-पेंच में पारंगत हो चुके येद्दियुरप्पा ने जद (एस) से हाथ मिला लिया और एचडी कुमारस्वामी सरकार में उपमुख्यमंत्री के रूप में शामिल हुए। इस सरकार में 20:20 के फार्मूले पर सहमति बनी थी, जिसके तहत 20-20 महीने के लिए प्रत्येक दल का मुख्यमंत्री होगा।

अक्टूबर 2007 में जब येद्दियुरप्पा के मुख्यमंत्री बनने की बारी आई तो कुमारस्वामी ने मुख्यमंत्री पद छोड़ने से इन्कार कर दिया। इसके बाद येद्दियुरप्पा और उनकी पार्टी के सभी मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया। पांच अक्टूबर को भाजपा ने कुमारस्वामी सरकार से औपचारिक समर्थन वापस ले लिया। परिणामस्वरुप सात नवम्बर 2007 को कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।

अंतत: जद (एस) और भाजपा 12 नवम्बर 2007 को येद्दियुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, हालांकि मंत्री पदों की साझेदारी पर मतभेदों के चलते जद (एस) द्वारा सरकार से समर्थन वापस ले लिए जाने के कारण 10 नवम्बर को उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। अपने अंतर्विरोधों को त्यागने का निर्णय लिया, जिससे येद्दियुरप्पा के मुख्यमंत्री बनने का मार्ग प्रशस्त हो गया।

येद्दियुरप्पा 30 नवम्बर 2008 को दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। इसी कार्यकाल में गैरकानूनी खनन मामले में लोकायुक्त की रिपोर्ट के आधार पर पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के दबाव के चलते 31 जुलाई 2011 को उन्हें मुख्यमंत्री पर से इस्तीफा देना पड़ा। येद्दियुरप्पा के दो पुत्र राघवेंद्र और विजयेंद्र तथा तीन पुत्रियां हैं।