नो गवर्नेन्स वाले राज्य में चिंतन से वहां की सरकार बचा पाएगी कांग्रेस!

सिरोही। कांग्रेस में वैचारिक शून्यता की स्थिति पूरी पराकाष्ठा पर पहुंच गई है कहने में किसी को अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए। ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है कि सोनिया गांधी अपना चिंतन शिविर उस राज्य में करवा रही है जहां कार्यकर्ताओं को कुचलकर कांग्रेस अब अपनी मरणासन्न स्थिति में पहुंच चुकी है। तो क्या इस चिंतन शिविर में कांग्रेस खुदको देश में बचाने से पहले इसी राज्य में बचाने के लिए कुछ उपचरात्मक उपाय कर सकेगी? ये देखना महत्वूपूर्ण है।

राजस्थान में कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार है। जाहिर है कांग्रेस के चिंतन शिविर के लिए इससे बेहतर जगह नहीं हो सकती। क्योंकि अप्रत्यक्ष सरकारी प्रोटोकॉल में इतनी बेहतर व्यवस्था किसी विपक्ष शासित राज्य में नहीं हो सकती थी। लेकिन, क्या कांग्रेस का चिंतन शिविर उसकी दशा में कुछ सुधार कर पाएगा? क्या देश की सबसे पुरानी पार्टी भाजपा और आप जैसे पार्टियों के सामने अपना वजूद बचा पाएगी? तो जवाब एक ही है, नहीं। कांग्रेस को खत्म होना ही है और इसे कोई रोक सकता है तो सिर्फ खुद कांग्रेस।

कांग्रेस को खुद गांधी परिवार और कांग्रेस के बुर्जुआ नेता किस तरह से बर्बाद कर रहे हैं राजस्थान खुद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस के 2018 में वापसी का श्रेय सिर्फ और सिर्फ सचिन पायलट को है। उन्होंने संघर्ष करके जो राज्य के अंतिम कोने तक के कार्यकर्ताओं को जोड़कर रखा उसके कारण कांग्रेस की सत्ता में तब फिर से वापसी हुई जब लोग कह रहे थे कि मोदी युग चल रहा है। उस समय अशोक गहलोत मुख्यमंत्री नहीं थे तो जनता के भाजपा के कुराज के विरुद्ध संघर्ष में उतरना उनकी शान के खिलाफ था। जो हाल 2008-13 और 2019 के बाद वसुंधरा राजे का है वही गहलोत का है।

लेकिन, सत्ता में रहते हुए वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत की कार्यप्रणाली में दो महत्वपूर्ण अंतर है। इन्हीं अंतरों की वजह से इस बार 2023 में कांग्रेस की भाजपा से ज्यादा दुर्गति होनी निश्चित है। एक अशोक गहलोत का प्रशासनिक मशीनरी को जनता के उत्पीड़न के लिए खुला छोड़ देना दूसरा पार्टी में गुटबाजी टालने के लिए अंतिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं को राजनीतिक और सांगठनिक नियुक्तियों से दूर रखकर संगठन को मृत बना देना।

ये तीसरी बार हुआ है कि जब गहलोत ने कांग्रेस और राज्य की जनता का ये हाल किया है। स्वयं की कुर्सी बचाने के चक्कर में गहलोत ने कांग्रेस की तिलांजलि पहली बार नहीं दी है। हाल ये है कि विधायकों के लिए मंत्रियों द्वारा अपने घरों के दरवाजे तक नहीं खोलने की घटनाएं भी सामने आई हैं। ऐसे हालत में सरकार और संगठन के बीच जो दूरी बन चुकी है वो पाटना अब कांग्रेस के लिए अंसभव है।

जनता से सीधे तौर ओर जुड़े कार्यकर्ताओं को राजनीतिक नियुक्तियों से वंचित रखने के कारण अब अधिकारी कार्यकर्ताओं को भाव नहीं देते। स्थिति यह हो गई है कि खुद अशोक गहलोत के किए वादों को अटकाने में अधिकारी और यहां तक कि सरकारी कार्यालयों के बाबू कोई हील हुज्जत नहीं करते। पूर्व मुख्य सचिव निरंजन आर्य के समय तो कई बार प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा आम जनता के कामों को अटकाने के आरोप खुद कांग्रेस और उनके सहयोगी लगा चुके हैं।

वैसे गहलोत खुद उससे अलग नहीं कर रहे हैं, जो कि राष्ट्रीय नेतृत्व करता है। वो है अपनी कार्यप्रणाली में बदलाव नहीं करना। वो इस वास्तविकता को स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि सरकारी कार्यालयों में योजनागत नियमों के तहत आम जनता के कामों के होने की सहूलियत ही सुराज है न कि संगठन और सत्ता में शामिल नेताओं और उनके बच्चों के सर्वांगीण विकास के आगे आमजन के हितों को दरकिनार करना।

कांग्रेस यदि उत्तर प्रदेश भाजपा द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी उत्तर प्रदेश चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन की रिपोर्ट से ही कुछ नहीं सीखी तो अंतिम राज्य भी खोने को तैयार रहना चाहिए। उत्तर प्रदेश भाजपा द्वारा पीएमओ को भेजी रिपोर्ट का मूल आधार ये ही था कि भाजपा के मूल वोटर खिसक गया हैं और वह सिर्फ इस बार बसपा के वोट शिफ्ट होने की वजह से जीत पाई है। यानी उसका हिंदुत्व और सरकारी योजनाओं के दाने गवर्नेन्स और महंगाई के आगे दम तोड़ गए।

अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे ने अपने मुख्यमंत्री काल में 1999 से लेकर 2022 तक राजस्थान में कई योजनाएं दी हैं। वो देना इनका अहसान नहीं मजबूरी है। जनता को निचोड़कर टेक्स के माध्यम से जो पैसा ये जुटा रहे है, उसका खर्च दिखाना और करना इनकी मजबूरी है कोई अहसान नहीं। फिर भी दोनों को हार देखनी पड़ी, उसकी वजह है जीरो गवर्नेन्स यानी नदारद सुराज।

एसीबी द्वारा सरकारी कर्मचारियों और कार्रवाई करने के बाद भी सरकार द्वारा उन अभियोजन की स्वीकृति नहीं देने के खेल को जनता समझ चुकी है। इससे गहलोत खुद को जनहितैषी नहीं बता सकते। जनता के दिलों में घर करना है तो कांग्रेस को 1970 से पहले की कांग्रेस बनना होगा।

यानी जनता के कामों के प्रति समर्पण के लिए कार्यकर्ताओं को आम जनता के बीच भेजना और जो भी अधिकारी उनके कामों को सही समय पर ना करें या उन्हें अनावश्यक रोड़े डालकर अटकाने की नीयत रखे उनके खिलाफ स्थानीय कांग्रेस नेता या जनप्रतिनिधि से फीडबैक लेकर तुरन्त कार्रवाई। अन्यथा कांग्रेस अपने इस चिंतन शिविर के साथ अपने अंतिम बड़े राज्य को खोने को तैयार रहे।