चीन का इरादा किसी भी देश को ऋण कुचक्र में फंसाना नहीं

चीन का इरादा किसी भी देश को ऋण कुचक्र में फंसाना नहीं
चीन का इरादा किसी भी देश को ऋण कुचक्र में फंसाना नहीं

फूशियान | चीन ने कहा है कि उसका इरादा किसी भी देश को ऋण कुचक्र में फंसाना नहीं है और उसने यह भी कहा कि वह बेल्ट एंड रोड पहल (बीआरआई) के तहत दक्षिण एशियाई देशों को गरीबी के कुचक्र से मुक्ति दिला कर आर्थिक एवं व्यापारिक प्रगति करने का मौका उपलब्ध कराना चाहता है।

चीन के दक्षिणी प्रांत युन्नान के मशहूर पर्यटन स्थल एवं स्वच्छ पानी की सबसे बड़ी झील फूशियान के तट पर एक रिसॉर्ट में शुक्रवार को आयोजित पहले चीन दक्षिण एशिया सहयोग मंच की बैठक के बाद युन्नान प्रांत में स्थित विदेश विभाग के महानिदेशक ली जिमिंग ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि बीआरआई परियोजना विभिन्न पक्षों से विचार विमर्श करने एवं सहमति लेने के बाद परस्पर लाभ सुनिश्चित करने के मकसद से बनायी गयी है। उन्होंने एक सवाल के जवाब में यह भी कहा कि युन्नान प्रांत सहित चीन में बनने वाली तकरीबन सभी आर्थिक गतिविधियां बीआरआई के अंतर्गत ही बनायीं जा रहीं हैं।

दक्षिण एशिया के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 80 प्रतिशत केवल भारत से होने के बावजूद बीआरआई से उसकी दूरी के बारे में एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि इस परियोजना को लेकर राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच भी बात हुई है। श्री मोदी की इस साल चीन की दो बार यात्रा हुई है। राष्ट्रपति शी भारत एवं चीन के बीच द्विपक्षीय सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्धता जाहिर कर चुके हैं।

ली ने कहा कि चीन सरकार ना केवल दक्षिण एशिया बल्कि लैटिन अमेरिका, अफ्रीका आदि क्षेत्रों के देशों को ढांचागत विकास के लिए ऋण देती रही है। ये ऋण सरकारों और कारोबारी प्रतिष्ठानों दोनों को दिये जाते हैं। सरकारों को दिये जाने वाले ऋण बहुत कम ब्याज़ पर दिया जाता है जबकि कारोबारी प्रतिष्ठानों को मिलने वाले ब्याज़ की दर अधिक होती है। उन्होंने कहा कि इन ऋणों को देने के पहले सरकारें या कंपनियां वित्तीय व्यवहार्यता अध्ययन करतीं हैँ और ऋण को चुकता करने की क्षमता का आकलन करने के बाद ही ऋण लेतीं हैं। इस प्रक्रिया में चीन सरकार की कोई भूमिका नहीं होती है।

श्रीलंका, पाकिस्तान एवं मालदीव जैसे कुछ दक्षिण एशियाई देशों को भारी भरकम ऋण देकर उन्हें ऋण के कुचक्र में फंसाने की आशंकाओं का उल्लेख करने पर श्री ली ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि ऐसा कुछ होने की संभावना है।” चीन में सूचना प्रौद्योगिकी और फार्मास्युटिकल्स उद्योग को लेकर आयात प्रतिबंधों के कारण भारत सहित कई एशियाई देशों के समक्ष पेश आ रहीं कारोबारी बाधाओं के बारे में सवाल पूछे जाने पर उन्होंने कोई साफ जवाब नहीं दिया। उन्होंने कहा कि ये नीतिगत बातें हैं जिन पर समुचित फोरम पर बात चल रही है।