20 साल पहले हुए ‘चिंतन’ को लागू नहीं कर पाए CM गहलोत, जनता और सरकार के बीच दीवार बने कार्मिक!

राजस्थान प्रदेश कांग्रेस के ट्विटर हैंडल ओर किया जा रहा वो दावा जिसे पूरा करने में अशोक गहलोत सरकार के अधिकारी ही दीवार बन गए हैं।
राजस्थान प्रदेश कांग्रेस के ट्विटर हैंडल ओर किया जा रहा वो दावा जिसे पूरा करने में अशोक गहलोत सरकार के अधिकारी ही दीवार बन गए हैं।

सबगुरु न्यूज-सिरोही। उदयपुर में कांग्रेस का नव चिंतन शिविर सम्पन्न हो गया है। लेकिन, इस नवचिन्तन शिविर में जिस मुद्दे को सबसे ज्यादा कार्य व्यवहार में लाने की जरूरत है वो है गवर्नेन्स। 2002 में राजस्थान में हुए चिंतन शिविर में जिस बात पर सबसे ज्यादा जोर देने की बात कही थी वो थी गवर्नेन्स। यानी जनता का राज को वाकई जनता का राज बनाने की नीति। सम्भवतः इसी मुद्दे पर जनता ने 2004 में फिर से कांग्रेस को केंद्र में फिर से सत्ता सौंपी।
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तो खुद 20 साल बाद तक राजस्थान में गुड गवर्नेंस नहीं दे पाए हैं। इसका उदाहरण सिरोही जिले के कुछ मामलों से समझने की कोशिश करेंगे कि किस तरह से गैर जवाबदेह अधिकारियों और मातहत कार्मिकों ने आम जनता पर राजतांत्रिक मानसिकता थोपकर ईस्ट इंडिया कम्पनी मॉडल को प्रतिस्थापित किया है।

ताज्जुब है कि इस तरह के मामले सामने आने के बाद भी किस तरह से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इन पर कार्रवाई पर विफल रहे हैं। संविधान में जो कार्यपालिका जनता और सरकार के बीच पुल की भूमिका निभाने के लिए बनाई गई थी, अशोक गहलोत सरकार में गवर्नेन्स के मामले में वो ब्यूरोक्रेसी अब खाई और दीवार की भूमिका में आ चुकी है।

राजस्थान की बात करें तो कांग्रेस हो या भाजपा  दोनो ही गवर्नेन्स देने में नाकाम रहीं। यही कारण है कि जनता ने तमाम योजनाओं को गिनाने के बाद भी इन्हें वापस काबिज नहीं होने दिया। अधिकारियों और नेताओं की बैठक में सिर्फ और सिर्फ एक बात की चर्चा होती है और वो है फ्लैगशिप योजनाएं। कभी इस बात की चर्चा नहीं होती कि आम जनता के रूटीन कामों की कितने मामले या पत्रावलियां कितने दिन से पेंडिंग हैं। जनता को गवर्नेन्स का फायदा और उसके इम्प्लीमटेशन को दिखाने का सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म है नगर निकाय और पंचायतें।
कांग्रेस के चिंतन शिविर में लिए गए निर्णयों के अनुसार ये ही वो प्लेटफार्म है जहां से कांग्रेस जनता से सीधे जुड़ सकती है। भाजपा राज में भाजपा ने इन दोनों संस्थाओं को गवर्नेन्स से दूर रखने का काम किया तो गहलोत सरकार भी उसी नक्शे कदम पर चलती रही। हाल में सिरोही में प्रभारी मंत्री और प्रभारी सचिव के समक्ष उठे मामले ये बताने को काफी है कि किस तरह मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खुदके कार्यालय द्वारा नियुक्त अधिकारियों ने गुड गवर्नेंस को अपहृत करके जनता के हितों को बंधक बना लिया है।
1. इस बैठक के बाद हुई पत्रकार वार्ता में जावाल में हुए भ्रष्टाचार का मुद्दा उठा। जावाल पट्टा प्रकरण में कथित रूप से शामिल कार्मिक को सरकार द्वारा निलंबित किया गया। वो कार्मिक उच्च न्यायालय जाकर से ले आया। फिर से गहलोत सरकार को चुनौति देकर सिरोही में ही काबिज हो गया।

पत्रकार वार्ता में सिरोही विधायक संयम लोढ़ा ने बताया था कि से वेकेट करवाने के लिये पंचायत राज विभाग को पत्र लिखा गया। पंचायत राज विभाग इसे दो महीने तक अटकाए रहा। इससे जनता में ये सन्देश गया कि गहलोत सरकार भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों के समर्थन में हैं। खयड5 जिला कलेक्टर ने इसकी तस्दीक की।
2. दूसरा मामला जो पत्रकार वार्ता में आया वो था सिरोही नगर पालिका का। इसमें राजीव नगर आवासीय योजना के प्लॉटों के आवंटन के निर्देश जिले के प्रभारी मंत्री ने 6 महीने पहले हुई बैठक में दिए थे। विधायक ने इस पर कार्रवाई नहीं होने पर पत्रकार वार्ता के दौरान मंत्री के समक्ष नगर परिषद आयुक्त पर नाराजगी जताई। जनता के हित के बीच आयुक्त बाधा बनकर खड़े हो गए।
3. जनता और कांग्रेस के बीच बढ़ती खाई को बढ़ाने वाला तीसरा मामला जो आया वो था सिरोही शहर का जोनल प्लान का मामला। सिरोही के विधायक ने ही पत्रकार वार्ता के दौरान मंत्री को बताया कि सिरोही का मास्टर जोनल प्लान बनाकर भेजे हुए कई महीने हो गए। इसे जोधपुर में बैठा अधिकारी अटकाए हुए बैठे हैं।
इसके बिना हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार सिरोही के मास्टर प्लान 2030 के अनुसार रिहायशी क्षेत्र की भूमि का कन्वर्जन नहीं हो पा रहा है। जिससे लोगों में गहलोत सरकार द्वारा जनता के हित के प्रति सजग नहीं होने का सन्देश जा रहा है। इसका भी कारण अशोक गहलोत द्वारा नियुक्त अधिकारियों के मातहत कार्यरत कार्मिक।
4. पत्रकार वार्ता में चौथा मामला सामने आया माउंट आबू के बिल्डिंग बायलॉज से अनुसार जोन निर्धारित थे। मुख्यमंती कार्यालय से तैनात उपखंड अधिकारी गौरव सैनी को कार्यकारी आयुक्त का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था। उन्होंने मुख्यमंत्री की मंशा अनुसार लोगों को राहत देने की बजाय इसमे अड़ंगा अटकाया और एक मार्गदर्शन जयपुर डीएलबी से मांगा। इससे उन्होंने माउंट आबू में सुप्रीम कोर्ट के मार्गदर्शन में नव निर्माण की राह में अड़ंगा डाला। एक छोटे से काम को डीएलबी अधिकारियों ने दो साल अटका कर रखा। गौरव सैनी द्वारा नगर परिषद कॉंग्रेस के बोर्ड को प्रताड़ित करने के खिलाफ धरना भी दिया गया।
पत्रकार वार्ता में नगर परिषद के नेताओं के कारनामे उजागर करने की बात कहने के बाद इन्हीं के कार्यकाल के समय की कांग्रेस नेताओं की नगर पालिका कार्मिक के साथ ऑडियो लीक हुई थी। सिरोही विधायक संयम लोढ़ा के विधानसभा में प्रकरण उठाने के बाद 25 अप्रैल को सब बाधाएं दूर हो गई तो माउंट आबू नगर पालिका में बैठे आयुक्त या उपखंड अधिकारी में से किसी ने जिला कलेक्टर को इसे आबू विकास समिति में रखने का मिस्फीड करके इसका नोटिफिकेशन अटका दिया। संयम लोढ़ा ने प्रभारी मंत्री के सामने बाबुओं द्वारा मामले को जानबूझकर लटकाने को लेकर नाराजगी जताई थी।
5. अब माउंट आबू में आये नए उपखंड अधिकारी कनिष्क कटारिया की कार्यप्रणाली खुद मुख्यमंत्री और कांग्रेस सरकार की जनहितकारी नीतियों के दावों को सवालों के घेरे में ला देने की है। सुप्रीम कोर्ट के ईको सेंसेटिव जोंस को लेकर उत्तराखंड के ऐसे तमाम निर्देश सामने आए हैं कि जिसमें न्यायालय ने जोनल प्लान के तहत नियमानुसार निर्माण मरम्मत को रेस्ट्रिक्ट करने की अधिकारियों और यहां तक कि स्थानीय उच्च न्यायालय के आदेशों को रोककर रेगुलेट करने के निर्देश दिए हैं।

आरोप ये लग रहे हैं कि माउंट आबू के नए उपखंड अधिकारी रेगुलेशन की बजाय रिस्ट्रिक्शन की नीति पर चलकर पसन्द नापसंद के अनुसार मरम्मत के लिए निर्माण सामग्री जारी कर रहे हैं। अभी ताजा ताजा चर्चा ये है कि दो गाड़ी भरकर टिन शेड पहुंचे हैं तो सवाल ये जब नगर परिषद के जनप्रतिनिधि एसडीएम को मरम्मत मटेरियल नहीं लाने के कारण विकास अटकने की दुहाई का ज्ञापन दे रहे हैं तो एसडीएम के अधिकृत होते हुए ये दो गाड़ी टिन शेड लाने की अनुमति कौन दे रहा है? कल माउंट आबू के पालिकाध्यक्ष द्वारा सौंपे गए ज्ञापन में दिए बिंदु वर्तमान उपखंड अधिकारी के बैड गवर्नेन्स से गहलोत गवर्नमेंट को फेल करने की नीति की ओर इशारा कर रहा है।

कांग्रेस के कार्यकर्ताओ को निष्क्रिय करने की अधिकारियों की है कोशिश की सिरोही और जयपुर के चुनिंदा उदाहरण है। ये हालात सभी 33 जिलों में होंगे। जिनकी वजह से गैर जवाबदेह अधिकारियों और कार्मिकों ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को आम जनता के सामने किसी लायक नहीं छोड़ा जबकि ये काम जायज थे। ऐसा नहीं कि जनता के हितों के प्रति सभी अधिकारी  उक्त घटनक्रमों के प्रकाश में  आए एसडीएम, या डीएलबी के विभिन्न डायरेक्टरों या पंचायत राज विभाग के निदेशक की तरह ही असंवेदनशील ही होंगे। बेहतर अधिकारी भी हैं।

लेकिन सवाल ये है कि ऐसे संवेदन शून्य अधिकारियों को फील्ड में पोस्टिंग देकर जनता का उत्पीड़न करने की छूट की नीति के कारण अशोक गहलोत सरकार 20 साल पहले राजस्थान में हुए कांग्रेस के चिन्तन शिविर में किये गवर्नेन्स देने में वायदे को तीसरी सरकार में भी पूरा नहीं कर पाई तो 2022 के उदयपुर में जनता से दूरी कम करने के दावे पर कितना अमल कर पायेगी अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है।