पीएम केयर्स फंड से खरीदे गए 50000 वेंटिलेटर

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने कोरोना वायरस ‘कोविड-19’ संक्रमण के कारण गंभीर रूप से बीमार मरीजों के उपचार में इस्तेमाल के लिए 60,000 वेंटिलेटर खरीदने का ऑर्डर दिया है, जिनमें से 50,000 वेंटिलेटर पीएम केयर्स फंंड के जरिए खरीदे गए हैं।

स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिव राजेश भूषण ने मंगलवार को प्रेस ब्रीफिंग में बताया कि पीएम केयर्स फंड से करीब दो हजार करोड़ रुपए के 50,000 वेंटिलेटर खरीदे गए हैं। पीएम केयर्स फंड के जरिए और स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा खरीदे गए वेंटिलेटर में जीपीएस चिप्स हैं।

उन्होंने बताया कि इन 60,000 वेंटिलेटर में से 18,000 वेंटिलेटर की आपूर्ति विभिन्न राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में की जा चुकी है। कुल 60,000 वेंटिलेटर्स में से 96 प्रतिशत हिस्सेदारी मेक इन इंडिया वेंटिलेटर की है।

उन्होंने कहा कि अधिकतर वेंटिलटर की आपूर्ति सार्वजनिक क्षेत्र की दो इकाइयां कर रही हैं। इनमें से एक रक्षा मंत्रालय के अधीन सार्वजनिक क्षेत्र की नवरत्न कंपनी भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) 30,000 वेटिलेटर की आपूर्ति कर रही है और आंध्र प्रदेश सरकार की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी आंध्रा मेड-टेक जोन (एएमटीजेड) 13,500 वेंटिलेटर की आपूर्ति कर रही है।

भूषण ने कहा कि देश में वेंटिलेटर की आवश्यकता की पूर्ति के लिए सरकारी संस्थाएं और निजी क्षेत्र जिस तरह एकजुट हुए वह सराहनीय है। देश में वेंटिलेटर की आपूर्ति के लिए जहां एक ओर बीईएल और आंध्रा मेड-टेक जोन सामने आए हैं तो वहीं दूसरी ओर वाहन क्षेत्र की कंपनी मारुति सुजूकी भी अपना योगदान दे रही है।

मारुति सुजूकी की निर्माण इकाइयों का उपयोग करके एग्वा 10,000 वेंटिलेटर की आपूर्ति कर रही है। बीईएल को वेंटिलेटर के निर्माण में एक निजी कंपनी स्कैनर ने अपना सहयोग दिया है। वेंटिलेटर के पुर्जों की डिजाइन बनाने और उनके निर्माण में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने मदद की है।

उन्होंने बताया कि बीईएल द्वारा पहला स्वदेश निर्मित वेटिलेटर 30 मई को बना और उसके दो माह के भीतर 18,000 वेंटिलेटर विभिन्न राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के 700 से अधिक अस्पतालों के बीच वितरित किए जा चुके हैं। इन वेंटिलेटर को कब भेजा गया, कब इनकी डिलवरी हुई और कब इन्हें निर्धारित अस्पताल में लगाया गया, इसकी पूरी निगरानी के लिए एक डैशबोर्ड बनाया गया है।

सभी वेंटिलेटर पर जीपीएस चिप लगी है, जिससे उनकी स्थिति का पता चलता रहता है। वेंटिलेटर किस तरह काम कर रहे हैं, इसके लिए उन सभी अस्पतालों को एक पेज का फीडबैक फॉर्म दिया जाता है, ताकि वे इसमें वेंटिलेटर के कार्य के बारे में अपनी राय बता सकें। वे अपनी राय ईमेल आदि के जरिये भी भेज सकते हैं।

वेंटिलेटर को लेकर प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश के लिए एक-एक व्हाट्स ग्रुप भी बनाया गया है। इस तरह कुल 36 व्हाट्स ग्रुप हैं, जिसमें संबद्ध राज्य से संबंधित मंत्रालय के लोग, राज्य के प्रतिनिधि, अस्पतालों के चिकित्सक और आपूर्तिकर्ता अपनी बात रख सकते हैं। डॉक्टर इन वेंटिलेटर का इस्तेमाल कैसे करें, इसके बारे में वीडियो भी ग्रुप में डाली जाती है।

भूषण ने बताया कि कोरोना वायरस कोविड-19 से पहले वर्ष 2019 में वेंटिलेटर का बाजार 444.74 करोड़ रुपए का था। उस वक्त देश में आयातित वेंटिलेटर का ही बोलबाला था। उस समय आयातित वेंटिलेटर की बाजार में 75 प्रतिशत हिस्सेदारी थी और जो घरेलू निर्माता वेंटिलेटर बना भी रहे थे वे उसके कई पुर्जे जैसे ऑक्सीजन सेंसर, एयरफ्लो सेंसर, प्रेशर सेंसर, स्टेपर मोटर ड्राइव, टर्बाइन और कंट्रोल वॉल्व आदि विदेश से मंगा रहे थे। इन वेंटिलेटर की कीमत 10 से 20 लाख रुपए के बीच थी।

उन्होंने कहा कि कोरोना ने लेकिन पूरे परिदृश्य को ही बदल दिया। वेंटिलेटर निर्यात करने वाले देशों जैसे अर्जेटिना, जर्मनी, अमरीका और स्वीट्जरलैंड ने कोरोना प्रकोप के कारण निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया। उस वक्त घरेलू वेंटिलेटर निर्माण बहुत ही कम स्तर पर हो रहा था।

इसके बाद मेक इन इंडिया वेंटिलेटर के लिए घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहित किया गया। ये वेंटिलेटर डेढ़ से चार लाख रुपए की कीमत के बीच होते हैं। एम्पावर्ड ग्रुप-3 ने वेंटिलटर का उत्पादन बढ़ाने के लिए उद्योग जगत को बढ़ावा दिया।