गरीबों की बस्ती है, यह जहां है वहीं रहेगी

हे! कोरोना यह गरीबों की बस्ती है। सदियों से यह जहां है वहीं रहेगी। कोरोना भले ही तूने इस दुनिया को हिला डाला। लाखों को बीमार कर हजारों को मौत के घाट उतार दिया। दुनिया के शक्तिमानों को तूने अपनी शक्ति का भान करा डाला और बता दिया कि मैं तो छोटा सा विषाणु हूं लेकिन मैने सारी दुनिया को लॉक कर डाला। हे कोरोना विज्ञान को तूने खुली चुनौती दे डाली साथ ही धर्म को आस्था की रेखा तक छोड़ दिया। तूने दुनिया में यह साबित कर दिया कि यह प्रकृति रहस्यों से भरी पड़ी है इसकी थाह पा लेना इतना आसान नहीं है।

हे कोरोना, यह गरीबों की बस्ती है और तेरे हर प्रकोप से बेखोफ है। यहां तू आकर अपना नाम ही खराब करवाएगा क्योंकि इन्हें या तो खुद पर भरोसा है या भगवान पर भरोसा है। सदियों से इनकी यही कहानी है। फकीरी ही इनकी मौज है और फकीरी ही इनका भगवान है। हर विपदा में भी यह भगवान का ही दिल से नाम लेते हैं और हर दुर्लभ से दुर्लभ परिस्थितियों का सामना करते हुए जीते हैं और मरते हैं।

इन्हें बुखार भी हो जाता हैं तो बस यह एक चाय पीकर ही उससे राहत पाने का मनोबल रखते हैं। यह कोई प्राचीन कथा और कहानियां नहीं है वरन आधुनिक विश्व की ग्रामीण संस्कृति की सच्चाई है। गरीब भयंकर बीमारियों से भी नहीं घबराता है। वह घबराता है अपने पेट की भूख से और इसी कारण वह अपना जीवन खानाबदोश की तरह जीता रहा।

पेट की भूख मिटाने के लिए वह जगत के रैन बसेरे में भी जीवन को रैन बसेरे की तरह जीता रहा और अपना श्रम बेचकर न्यूनतम मजदूरी ही पाता रहा तथा मालिक को अतिरेक लाभ दिलाता रहा। बीमारियों से वह नहीं डरा और भयंकर बीमारियों से जूझते हुए भी अपना और परिवार का पेट पालता रहा। समय की सियासत ने उसे कभी उभरने नहीं दिया और वह रोना भी चाहता तो उस भगवान का नाम लेकर ही अपने भाग्य पर रोता रहा।

इसलिए हे कोरोना, यह मजदूर सदियों से जहां था वहीं रहा। भले ही इसे मजबूत बनाने के कई खेल रंगमंच पर दिखलाए जाते थे लेकिन जमीनी हकीकत में उनके अमल होने से पहले ही वह जगत के रेन बसेरों को छोड़ गया। दुनिया ने उसे बेपरवाह करार देकर मौत को भी बिना इलज़ाम लगाए बरी कर दिया।

हे कोरोना, तू गरीबों की बस्ती में आकर परेशान हो जाएगा और तेरे खौफ की धज्जियां उड जाएंगी। भले ही तू इसे मौत के घाट उतार देना पर मौत उसे दूसरी बीमारी के नाम से ही ले जाएगी। गरीब तूझे जानते हुए भी नहीं जानेगा क्योंकि तू उसके लिए महत्वपूर्ण नहीं है। उसके लिए एक ही महत्वपूर्ण है अपना और अपने परिवार का पेट भरना।

इसलिए हे कोरोना, तू गरीबों की बस्ती में हार जाएगा, भले ही तू तेरी महामारी के संक्रमण का खेल दिखाते रहना और अपनी सियासत से दुनिया को परेशान करते रहना। दुनिया तो फिर भी तेरे जाने के बाद जहां हैं वहां से अपनी असफलता को ढकती हुई आगे बढ जाएगी लेकिन यह गरीब फिर भी जहां है वही रहेगा और समाज इससे दूरियां बनाए रखेगा चाहे दूर रहकर या उसे अपना मजदूर मान कर।

संतजन कहते हैं कि हे मानव, जगत की यह ही सच्चाई है कि गरीब ने किसी भी विपदा में अपने आप को कमजोर नहीं समझा और गर्म पानी में थोडी सी चाय पत्ती डालकरर गुड या शक्कर मिलाकर अपनी रोटी खाता रहा। सिलबट्टे पर मिर्च पीसकर नमक मिला अपनी रात की रोटी खाता है।

सरकार भले ही उसे कितनी भी सुविधाएं दे पर वह दूसरों के द्वारा कब्जा ली जाती है चाहे जमीन जायदाद हो या कोई छोटी मोंटी सम्पति हो। उसे अनावश्यक की मुजरिम बनाने के भय से वह कांप जाता है और सारे जंजालों से मुक्ति पाने के लिए अभाव में ही जीता रहता है।

महामारी के कारण वह घर में ही बैठा रहता है और शहरों में कमाने खाने गया तो वहां से भाग अपने ही मूल गांव में आने के लिए निकल पडता है। उसे कोरोना जेसी महामारी की नहीं केवल उसे अपनों की ही फिक्र रहती है।

इसलिए हे मानव, तू दया कर और अपने आस पास झांककर देख और यथासंभव मदद कर। वह कही दूर फुटपाथ पर काटों की आढ करके कोई गरीब बैठा होगा और परमात्मा को प्रार्थना कर रहा होगा कि हे मालिक दया कर, इस महामारी को भगा ताकि में रोजी-रोटी कमा कर पेट भरता रहूं। मैं किसी का मोहताज नहीं बनूं, क्योंकि दुनिया की रीत है की वह कपड़ा नापती ज्यादा है और फाडती कम है। मनचली हवाएं आंखे बंद कर मेरे सामने से मजबूत बस्तियों की तरफ निकल जाती है।

सौजन्य : ज्योतिषाचार्य भंवरलाल, जोगणियाधाम पुष्कर