टिकटों को लेकर कांग्रेस और भाजपा में खींचतान!

जयपुर में सिरोही जिले के कांग्रेस नेताओं से टिकिटों के संबंध में चर्चा करते कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंदसिंह डोटासरा।
जयपुर में सिरोही जिले के कांग्रेस नेताओं से टिकिटों के संबंध में चर्चा करते कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंदसिंह डोटासरा।

सबगुरु न्यूज-सिरोही। जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों के लिए कांग्रेस और भाजपा में आशंकाओं और अविश्वास की स्थिति जारी है। कांग्रेस में जहां संयम लोढ़ा, कांग्रेस जिलाध्यक्ष जीवाराम आर्य और नीरज डांगी गुट के दावेदारों में एकदूसरे के प्रति अविश्वास हट नहीं रहा है।

पिण्डवाड़ा आबू क्षेत्र में लालाराम गरासिया भी प्राथमिकता में हैं। वहीं भाजपा में नारायण पुरोहित बनाम अन्य नेताओं के समर्थकों में में अविश्वास जड़ जमा चुका है। सोमवार को नामांकन की अंतिम तिथि है। ऐसे में कल तीन बजे तक स्थिति लगभग स्पष्ट हो जाएगी।
कांग्रेस में सिरोही विधायक संयम लोढ़ा व जिलाध्यक्ष के गुटों के दावेदारों बीच में जिला परिषद के साथ-साथ पंचायत समिति चुनावों को लेकर भी सिरोही विधानसभा में अविश्वास की स्थिति बरकरार है। आशंकित दावेदार इस पशोपेश में हैं कि जाएं तो जाएं कहां करें तो करें क्या?

जहां संयम लोढ़ा सिरोही और शिवगंज पंचायत समितियों के अधिकांश वार्डों में कांगे्रस को जिताने के लिए अपने विश्वस्त प्रत्याशियों को लाने के मूड में बताए जा रहे हैं तो जीवाराम आर्य भी कांग्रेस की जीत के लिए कटिबद्धता दर्शाते हुए अपनी भी भागीदारी चाह रहे हैं।  जिला परिषद सीटों के समर्थक  दावेदर भी जिला परिषद चुनावों के लिए संयम लोढ़ा पर जिले भर से नजर गढाए बैठे हैं। नीरज डांगी गुट वाले डांगी पर, जीवाराम समर्थक जीवाराम पर, वहीं अन्य गुटों प्रत्याशी अपने वरदहस्त नेताओं पर।

इस बार जिला प्रमुख की सीट सामान्य की है। यदि इस पर मजबूत दावेदार आया तो पूर्व जिला प्रमुख अनाराम बोराणा और चंदनसिंह देवड़ा की तरह लोढ़ा आदि के लिए सिरोही विधानसभा चुनावों में प्रतिद्वंद्वता बढऩे की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

यहां पर गहलोत गुट और सचिन गुट वाली खींचतान पहुंच चुकी है। प्रदेश से नियुक्त एक प्रतिनिधि गहलोत के करीबी बताया जा रहा हैं तो दूसरे को सचिन पायलट के गुट की बताया जा रहा है। अब देखना ये है कि गहलोत लॉबी को ज्यादा टिकिट मिलते हैं या पायलट लॉबी को।

वैसे अंदरखाने इस चर्चा से खुशी है कि प्रदेशाध्यक्ष डोटासरा ने बैठक के दौरान मुुंह पर तो एकसाथ चुनाव लडऩे और किसी का एकाधिकार नहीं रखने की बात कही है। लेकिन, राजनीति में जो मुंह पर कहा जाए वहीं किया जाए तो फिर नेता क्या? जो नेता मतदाताओं से वायदे नहीं निभाते वो अपनी ही पार्टी में ये नहीं करेंगे, इस पर यकीन करना मुश्किल है।

उधर भाजपा की खींचतान सबसे रोचक स्थिति में है। भाजपा में अविश्वास छा चुका है कि जिला अध्यक्ष नारायण पुरोहित अपने भाई को जिला प्रमुख बनाने को इच्छुक हैं। ऐसे में वो अपने करीबियों को ज्यादा से ज्यादा टिकिट दिलवाने के लिए लगेंगे। जिले की पंचायत समितियों में गठबंधनों की राजनीति से पार्टी में अंदरखाने जबरदस्त विरोध पैदा होने लगा है।

कालंद्री में वार्ड संख्या पांच के लिए पर्यवेक्षकों द्वारा फीडबैक लेने के मामले में तो पार्टी के लोगो द्वारा पर्यवेक्षक को अपने साथ वहां के दावेदार के किसी रिश्तेदार को साथ नहीं बैठाने को लेकर काफी झिकाल होने की जानकारी सामने आई है।

भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष लुम्बाराम चौधरी ने अपने लिए सुरक्षित सीट का चयन कर लिया है। ऐसे में वो खुदको जिला प्रमुख बनवाने के लिए अपने विश्वस्तों को टिकिट दिलवाने की जुगत में हैं। चौधरी सांसद देवजी पटेल के करीबी बताए जाते हैं।
वैसे यहां पर फिर से विधायकी लडऩे के इच्छुक पूर्व विधायक ओटाराम देवासी भी चुनावों से पहले सक्रिय हो चुके हैं। उनके वजन को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता। यहां भी सभी दावेदार कांग्रेस की तरह अपने अपने गॉड फादर्स पर नजरें गढ़ाए बैठे हैं।