सिरोही : अधिकारियों की गुड बुक के लिए, स्कूली विद्यार्थियों से बेड ट्रीटमेंट

सिरोही के अरविंद पेवेलियन में तपती धूप में बैठे बच्चे।

सिरोही। जिला अधिकारियों ने अपनी गुड बुक बनाने के लिए सरकारी और निजी स्कूल के बच्चों के मूल अधिकारों के शोषण को अपना हक बना लिया है। कहने को जिले में बच्चों के अधिकारों के शोषण को रोकने के लिए जिला बाल कल्याण समिति बनी है। लेकिन, इससे बेखौफ ये अधिकारी अनवरत बच्चों को तपती धूप, बारिश और सर्दी में अपने सरकारी आयोजनों में इन बच्चों के इस्तेमाल से बाज नहीं आ रहे।

स्वतंत्रता के 75वें साल में भी राष्ट्रीय कार्यक्रम की पूर्व तैयारियों के दौरान भी सिरोही के बच्चों को अपने एयर कंडीशन कमरों में बैठे जिले के प्रशासनिक अधिकारियों ने वो सुविधाएं नहीं उपलब्ध करवाई जिससे वो कड़कती धूप से बच सकें। इतनी सुविधा तो नरेगा मजदूरों को भी उपलब्ध करवाई जाती है। परिणामस्वरूप मंगलवार को अरविंद पेवेलियन में पूर्व तैयारियों के दौरान स्कूली बच्चों को घण्टों धूप में बैठाए रखा गया, जिससे कई बच्चों को स्कूल लौटने पर चक्कर आने और उल्टी होने की समस्या भी हुई।

ना छाया, ना ढंग का पानी

जिला प्रशासन द्वारा अरविंद पेवेलियन में बच्चों का जमावड़ा लगा लिया गया। इन्हें पीटी, परेड, गाने और नृत्य की तैयारियों के लिए बुलवाया गया। बच्चों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि पेवेलियन के शेड भी छोटे पड़ गए। यहां बच्चों के बैठने के लिए छाया की कोई व्यवस्था नहीं थी। चिलचिलाती धूप में बच्चे समूह के रूप में पेड़ों के नीचे बैठते दिखे।

जिले की शिक्षा अधिकारी ने गाना गवाने के लिए बच्चों को बैठा लिया। गाने वाले बच्चे अलग थे, लेकिन उनकी आवाज नहीं आने से पीटी परेड के बच्चों को भी इसमें शामिल कर लिया। इन अधिकारी समेत कुछ शिक्षक खुद छाया में खड़े होकर बच्चों को धूप में बैठाकर गाना गवाने लगे। इनके आगे फिर कौन शिक्षक बोले तो शेष गतिविधियों के बच्चे इधर उधर छाया तलाशते दिखे। सुबह नौ बजे अरविंद पेवेलियन गए बच्चों को 12 बजे तक रोके रखा गया।

फिर कुछ शिक्षकों से बच्चों ने समस्या बताई तो शिक्षकों ने प्रतिरोध किया। फिर कुछ बच्चों को शेड के नीचे बैठाकर गानों की प्रैक्टिस शुरू करवाई। पानी के लिए नगर पालिका से एक टैंकर मंगवा दिया। तपती धूप में खौलता पानी बच्चों के पीने के लिए था। केम्पर थे, लेकिन वो ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर। इन्हें शिक्षक ज्यादा यूज करते दिखे।

सिरोही में अरविंद पेवेलियन में स्वतंत्रता दिवस समारोह की पूर्व तैयारी में पेड़ की छाया में बैठे बच्चे।

बच्चों के मंच को बना दिया है शिक्षक का मंच

राष्ट्रीय समारोह में निःसन्देह बच्चों की भूमिका को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, लेकिन जिला प्रशासन बच्चों के इन अधिकारों को भी कई शिक्षकों द्वारा हड़पने के लिए पिछले दो दशकों से प्रोत्साहित कर रहा है। इससे बच्चों की प्रतिभा से ज्यादा विशेष शिक्षकों की आत्मसंतुष्टि का मंच बनाकर रख दिया है। सिरोही को छोड़कर शायद ही देश के किसी राष्ट्रीय कार्यक्रम में शिक्षक की परफॉर्मेंस दिखाने के लिए बच्चों की परफॉर्मेंस को दबाने का कार्य किया जाता होगा।

यहां तक कि सिरोही के ही उपखण्ड, ब्लॉक स्तर और पंचायत स्तर के कार्यक्रम भी अरविंद पेवेलियन के कार्यक्रम से ज्यादा स्तरीय होते हैं। यहां पर उपखण्ड अधिकारी और पंचायत सचिव बच्चों को प्रतिभा का मंच उपलब्ध करवाते हैं। लेकिन, जिला कलेक्टरों ने सिरोही जिला मुख्यालय में राष्ट्रीय आयोजन में अरविंद पेवेलियन में बच्चों के मंच देने की बजाय अपने या नेताओं के करीबी शिक्षकों को देने की परंपरा को 2 दशकों से त्यागा नहीं है। राष्ट्रीय कार्यक्रम को नाम रंगारंग दिया जाता है। लेकिन पिछले 2 दशकों में हुए 80 कार्यक्रमों को जिले की सेलेक्शन कमिटी ने एकाकी मंच बनाकर रख दिया है।

जिला स्तरीय राष्ट्रीय कार्यक्रम की आजोयक कमिटी को सिरोही में ही राज्य स्तरीय हॉकी प्रतियोगिता के दौरान इसी अरविंद पैवेलियन में रंगारंग कार्यक्रम करवाने वाली समिति से सीख लेनी चाहिए। ये दोनों कार्यक्रम ये बता देंगे कि रंगारंग कार्यक्रम से लोगों को बांधने और दो दशकों से बीस-बीस मिनट लंबे एकाकी और मोनोटोनस कार्यक्रम से लोगों को बोर करने में क्या अंतर है।

रैलियों में ले जाते हैं सरकारी विभाग

इस सम्बंध में एक सामान्य चर्चा के दौरान एक अभिभावक इस बात की शिकायत करते भी नजर आए कि बच्चों को स्कूल पढ़ने भेजते हैं। स्कूल वाले उन्हें विभिन्न सरकारी विभागों की जन जागरूकता रैली में भेज देते हैं। जिला मुख्यालय पर शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य विभागों की होने वाली रैलियों में यहां की स्कूल के बच्चों के बिना उनके अभिभावकों की अनुमति और विद्यालय की मंशा के जिले के आला अधिकारियों के आदेश पर भिजवा दिया जाता है।

बच्चों की शिक्षा के अधिकारों का उल्लंघन करते हुए इन रैलियों में स्कूली बच्चों के इस्तेमाल करने से उनकी पढ़ाई पर क्या फर्क पड़ेगा इससे इनको कोई लेना देना नहीं है। बच्चों की रैली को झंडी दिखाती फोटो अखबारों में छपवाने और फाइलिंग करवाकर उसके फंड का इस्तेमाल दिखाने के लिए जिले के अधिकारी स्कूली बच्चों का बन्दुआ मजदूरों की तरह शोषण की प्रवृत्ति त्यागने को तैयार नहीं हैं। जिला मुख्यालय पर अधिकांश रैलियां अहिंसा सर्किल से शुरू होती हैं। ऐसे में सबसे ज्यादा शोषण पुराना भवन और नवीन भवन स्कूल के सुबह के शिफ्ट के बच्चों का होता है।