असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है दशहरा

dasara 2019
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आज देश भर में दशहरा या विजयदशमी धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है । रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले जलाकर हजारों साल से लोग इस दिन को विजय उत्सव के रूप में मनाते आ रहें हैं । आज भी वैसे ही होगा जो वर्षों से हो रहा है । देश के अलग-अलग कोनों में रावण दहन और मेलों के आयोजन हाेंगे ।

दशहरा या विजयदशमी हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार है । यह असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है । मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने दशमी के दिन 10 सिर वाले अधर्मी रावण का वध किया था, यही नहीं इसी दिन मां दुर्गा ने महिषासुर नाम के दानव का वध कर उसके आतंक से देवताओं को मुक्त किया था । नवरात्रि के नौ दिनों के बाद 10वें दिन नौ शक्तियों के विजय के उत्सव के रूप में विजयदशमी मनाई जाती है ।

शारदीय नवरात्र के 10वें दिन और दीपावली से ठीक 20 दिन पहले दशहरा आता है । हिन्दू कैलेंडर के अनुसार आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को विजयदशमी या दशहरे का त्योहार मनाया जाता है । दशहरा का धार्मिक महत्व तो है ही लेकिन यह त्योहार आज भी बेहद प्रासंगिक है । आज भी कई बुराइयों के रूप में रावण जिंदा है । यह त्योहार हमें हर साल याद दिलाता है कि हम बुराई रूपी रावण का नाश करके ही जीवन को बेहतर बना सकते हैं । महंगाई, भ्रष्टाचार, व्यभिचार, बेईमानी, हिंसा, भेदभाव, ईर्ष्या-द्वेष, पर्यावरण प्रदूषण, यौन हिंसा और यौन शोषण जैसी तमाम ऐसी बुराइयां हैं जो आज सभ्य समाज को चुनौती दे रही हैं ।

दशहरा के दिन पूजा की परंपरा, कोई नया काम किया जाए तो मिलती है सफलता

दशहरा का विजय मुहूर्त सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है । मान्यता है कि शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए इसी समय निकलना चाहिए । ऐसा माना जाता है कि इस मुहूर्त में कोई भी नया काम किया जाए तो सफलता अवश्य मिलती है । इस दिन शस्त्र पूजा के साथ ही शमी के पेड़ की पूजा की जाती है । इस दिन क्षत्रिय शस्त्र पूजा करते हैं, जबकि ब्राह्मण शास्त्रों का पूजन करते हैं । वहीं व्यापार से जुड़े वैश्य लोग अपने प्रतिष्ठान और गल्ले की पूजा करते हैं । साथ ही नई दुकान या कारोबार का शुभारंभ भी करते हैं । दरअसल, प्राचीन काल में क्षत्रिय युद्ध पर जाने के लिए इस दिन का ही चुनाव करते थे । ब्राह्मण दशहरा के ही दिन विद्या ग्रहण करने के लिए अपने घर से निकलते थे । इस दिन काे खरीदारी के लिए लोग बहुत ही शुभ मानते हैं ।

मैसूर और कुल्लू का दशहरा भारत ही नहीं पूरे दुनिया भर में प्रसिद्ध है

कर्नाटक के मैसूर और हिमाचल प्रदेश के कुल्लू का दशहरा सिर्फ भारत में नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मशहूर है । 10 दिनों तक मनाया जाने वाला मैसूर का दशहरा उत्सव देवी दुर्गा के स्वरूप चामुंडेश्वरी द्वारा महिषासुर के वध का प्रतीक है । मैसूर में दशहरा मनाए जाने की परंपरा लगभग 500 सालों से भी ज्यादा पुरानी है । यहां दशहरा उत्सव के दौरान चामुंडेश्वरी मंदिर और मैसूर महल को भव्य तरीके से सजाया जाता है और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है । विजयदशमी के मौके पर मैसूर का राज दरबार आम लोगों के लिए खोल दिया जाता है ।

10वें दिन के उत्सव को जम्बू सवारी या अम्बराज कहा जाता है । इस दिन ‘बलराम’ नाम के हाथी और अन्य 11 गजराज को विशेष रूप से सजाया जाता है । बलराम के सुनहरे हौदे पर सवार होकर मां चामुंडेश्वरी नगर भ्रमण के लिए निकलती हैं । ऐसे ही हिमाचल प्रदेश के कुल्लू का दशहरा देश भर में काफी लोकप्रिय है । इस त्योहार को यहां ‘दशमी’ के नाम से जाना जाता है । यहां दशहरा एक दिन नहीं बल्कि सात दिन मनाया जाता है ।

कुल्लू में दशहरा विजयदशमी से शुरू होकर सात दिनों तक चलता है । यहां दशहरे की तैयारियां अश्विन महीने के पहले 15 दिनों से ही शुरू हो जाती हैं । सबसे पहले यहां के राजा सभी देवी-देवताओं को रघुनाथ जी के सम्मान में यज्ञ का न्योता देकर धालपुर घाटी बुलाते हैं । दशमी के दिन 100 से ज्यादा देवी-देवताओं को सजी हुई पालकियों में बैठाया जाता है । इन सात दिनों में रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है ।

सातवें दिन व्यास नदी के किनारे लंका दहन होता है । यहां रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण का पुतला नहीं जलाया जाता, बल्कि काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार के नाश के प्रतीक के तौर पर पांच पशुओं की बलि दी जाती है । आइए हम सभी आज विजयदशमी के शुभ अवसर पर रावण रूपी बुराई को खत्म करने का संकल्प लें, तभी दशहरे की सार्थकता बनी रहेगी ।