गुरुपूर्णिमा का महत्व, आपातकालीन स्थिति में गुरुपूर्णिमा कैसे मनाएं?

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्‍वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
अर्थ : गुरु स्वयं ही ब्रह्मा, श्रीविष्णु तथा महेश्‍वर हैं। वे ही परब्रह्म हैं। ऐसे श्री गुरु को मैं नमस्कार करता हूं।

उपरोक्त श्लोक हिंदू शास्त्र में कहा गया है। शिष्य के जीवन में गुरु का महत्त्व अनन्यसाधारण है। गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए गुरुपूर्णिमा मनाई जाती है। जो शिष्य का अज्ञान नष्ट कर उसकी आध्यात्मिक उन्नति हेतु जो साधना बताते हैं तथा उससे वह करवाते हैं एवं अनुभूति भी प्रदान करते हैं, उन्हें ‘गुरु’ कहते हैं।

गुरु का ध्यान शिष्य के ऐहिक सुख की ओर नहीं होता (क्योंकि वह प्रारब्धानुसार होता है), केवल उसकी आध्यात्मिक उन्नति की ओर रहता है। अन्य दिनों की तुलना में गुरुपूर्णिमा के तिथि पर गुरुतत्त्व सहस्र गुना कार्यरत रहता है। इस वर्ष आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा अर्थात गुरुपूर्णिमा 24 जुलाई को हैं।

सनातन संस्था द्वारा संकलित इस लेखमें गुरुपूर्णिमा का महत्व, गुरु-शिष्य परंपरा, गुरुपूर्णिमा मनाने की पद्धति इस विषय में जान लेंगे। इस वर्ष कोरोना की पृष्‍ठभूमि पर अनेक स्‍थानों पर यह गुरुपूर्णिमा महोत्सव सदैव की भांति करने में मर्यादाएं हो सकती हैं। इस लेख में कोरोना के संकटकाल के निर्बंध में भी गुरुपूर्णिमा महोत्सव कैसे मनाएं यह भी समझ लेंगे।

1. तिथि – आषाढ शुक्ल पूर्णिमाको गुरुपूर्णिमा एवं व्यास पूर्णिमा कहते हैं।
2. महत्त्व

गुरुपूर्णिमा गुरुपूजन का दिन है। गुरु पूर्णिमा का एक अनोखा महत्त्व भी है। अन्य दिनों की तुलना में इस तिथि पर गुरुतत्त्व सहस्र गुना कार्यरत रहता है। इसलिए इस दिन किसी भी व्यक्ति द्वारा जो कुछ भी अपनी साधना के रूप में किया जाता है, उसका फल भी उसे सहस्र गुना अधिक प्राप्त होता है।

गुरु-शिष्य परंपरा हिन्दुओं की लाखों वर्षों की संस्कृति की अद्वितीय परंपरा है। राष्ट्र और धर्म पर जब संकट मंडरा रहा हो तब सुव्यवस्था बनाने का महत्कार्य गुरु-शिष्यों ने किया है, यह गौरवशाली इतिहास भारत को मिला हुआ है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन, आर्य चाणक्य ने सम्राट चंद्रगुप्त तथा समर्थ रामदास स्वामी ने छत्रपति शिवाजी महाराज के माध्यम से तत्कालीन दुष्प्रवृत्तियों का निर्मूलन किया तथा आदर्श धर्माधारित राज्यव्यवस्था की स्थापना की थी। ऐसी महान गुरु परंपरा की विरासत की रक्षा करने तथा श्री गुरु के चरणों में शरणागत भाव से कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है गुरुपूर्णिमा। गुरुपूर्णिमा के दिन गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा अनादि काल से चल रही है।

गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं, गुरुपूर्णिमा पर सर्वप्रथम व्यास पूजन किया जाता है। एक वचन है – व्यासोच्छिष्टम् जगत् सर्वंम्। इसका अर्थ है, विश्व का ऐसा कोई विषय नहीं, जो महर्षि व्यास जी का उच्छिष्ट अथवा जूठन नहीं है अर्थात कोई भी विषय महर्षि व्यास जी द्वारा अनछुआ नहीं है। महर्षि व्यास ने चार वेदों का वर्गीकरण किया। उन्होंने अठारह पुराण, महाभारत इत्यादि ग्रंथों की रचना की है। महर्षि व्यास के कारण ही समस्त ज्ञान सर्वप्रथम हम तक पहुंच पाया । इसलिए महर्षि व्यास जी को ‘आदिगुरु’ कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि उन्हीं से गुरु-शिष्य परंपरा आरंभ हुई। आद्य शंकराचार्य को भी महर्षि व्यास जी का अवतार मानते हैं।

गुरुपूर्णिमा उत्सव मनाने की पद्धति

गुरु पूजन के लिए चौकी को पूर्व-पश्चिम दिशा में रखिए। जहां तक संभव हो, उसके लिए मेहराब अर्थात लघुमंडप बनानेके लिए केले के खंभे अथवा केले के पत्तों का प्रयोग कीजिए। गुरु की प्रतिमा की स्थापना करने हेतु लकड़ी से बने पूजा घर अथवा चौकी का उपयोग कीजिए। थर्माकोल का लघुमंडप न बनाइए। थर्माकोल सात्त्विक स्पंदन प्रक्षेपित नहीं करता। पूजन करते समय ऐसा भाव रखिए कि हमारे समक्ष प्रत्यक्ष सदगुरु विराजमान हैं। सर्वप्रथम श्री महागणपति का आवाहन कर देशकाल कथन किया जाता है। श्री महागणपति का पूजन करनेके साथ-साथ विष्णुस्मरण किया जाता है। उसके उपरांत सदगुरु का अर्थात महर्षि व्यासजी का पूजन किया जाता है। उसके उपरांत आद्य शंकराचार्य इत्यादि का स्मरण कर अपने-अपने संप्रदायानुसार अपने गुरु के गुरु का पूजन किया जाता है। यहां पर प्रतिमापूजन अथवा पादुका पूजन भी होता है। उसके उपरांत अपने गुरु का पूजन किया जाता है। इस दिन गुरु अपने गुरु की पूजन करते हैं।

आपातकालीन स्थिति में धर्मशास्त्र के अनुसार गुरुपूर्णिमा कैसे मनाए?

इस वर्ष भी कोरोना की पृष्ठभूमि पर अनेक स्‍थानों पर गुरुपूर्णिमा महोत्सव सदैव की भांति करने में मर्यादाएं हो सकती हैं। इस दृष्टि से वर्तमान परिस्थिति में धर्माचरण के रूप में क्या किया जा सकता है, इस पर भी विचार किया गया है। यहां महत्त्वपूर्ण सूत्र यह है कि हिन्दू धर्म ने धर्माचरण के शास्त्र में संकटकाल के लिए भी कुछ विकल्प बताए हैं, जिसे ‘आपद्धर्म’ कहा जाता है। आपद्धर्म का अर्थ है ‘आपदि कर्तव्यो धर्मः।’ अर्थात आपदा के समय आचरण करना आवश्यक धर्म।! यहां महत्त्वपूर्ण सूत्र यह है कि इससे हिन्दू धर्म ने कितने उच्च स्तर तक जाकर मनुष्य का विचार किया है, यह सीखने को मिलता है। इससे हिन्दू धर्म की विशालता ध्यान में आती है।

गुरुपूर्णिमा के दिन अधिकांश साधक अपने श्री गुरुदेव जी के पास जाकर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की श्रद्धा के अनुसार कुछ लोग श्रीगुरु, कुछ माता-पिता, कुछ विद्यागुरु (जिन्होंने हमें ज्ञान दिया, वे शिक्षक), कुछ आचार्य गुरु (हमारे यहां पारंपरिक पूजा के लिए आनेवाले गुरुजी), तो कुछ लोग मोक्ष गुरु (जिन्होंने हमें साधना का दिशादर्शन कर मोक्ष का मार्ग दिखाया, वे श्रीगुरु) के पास जाकर उनके चरणों में कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। इस वर्ष कोरोना संकट की पृष्ठभूमि पर हमें घर पर रहकर ही भक्ति भाव से श्री गुरुदेव जी के छायाचित्र का पूजन अथवा मानस पूजन किया, तब भी हमें गुरुतत्त्व का एक सहस्र गुना लाभ मिलेगा। प्रत्येक व्यक्ति की श्रद्धा के अनुसार भले ही इष्टदेवता, संत अथवा श्री गुरु अलग हों; परंतु गुरुतत्त्व एक ही होता है।

संप्रदाय के सभी भक्त पूजन का एक विशिष्ट समय सुनिश्चित कर संभवतः उसी समय अपने-अपने घरों में पूजन करें। ‘एक ही समय पूजन करने से संगठित शक्ति का अधिक लाभ मिलता है। अतः सर्वानुमत से संभवतः एक ही समय सुनिश्चित कर उस समय पूजन करें।

सवेरे का समय पूजन हेतु उत्तम माना गया है। जिन्हें सवेरे पूजन करना संभव है, वे सवेरे का समय सुनिश्‍चित कर उस समय पूजन करें। कुछ अपरिहार्य कारण से जिन्हें सवेरे पूजन करना संभव नहीं हो, वे सायंकाल का एक समय सुनिश्‍चित कर उस समय; परंतु सूर्यास्त से पहले अर्थात सायंकाल 7 बजे से पूर्व पूजन करें। जिन्हें निर्धारित समय में पूजन करना संभव नहीं है, वे अपनी सुविधा के अनुसार; परंतु सूर्यास्त से पहले पूजन करें।

सभी साधक घर पर ही अपने-अपने संप्रदाय के अनुसार श्रीगुरु अथवा इष्ट देवता की प्रतिमा, मूर्ति अथवा पादुकाओं का पूजन करें। चित्र, मूर्ति अथवा पादुकाओं को गंध लगाकर पुष्प समर्पित करें। धूप, दीप एवं भोग लगाकर पंचोपचार पूजन करें और उसके पश्‍चात श्री गुरुदेव जी की आरती उतारें। जिन्हें सामग्री के अभाव में प्रत्यक्ष पूजा करना संभव नहीं है, वे श्री गुरु अथवा इष्ट देवता का मानस पूजन करें।

उसके पश्‍चात श्री गुरुदेव जी द्वारा दिए गए मंत्र का जप करें। जब से हमारे जीवन में श्री गुरुदेव जी आए तब से जो अनुभूतियां हुई है उनका हम स्मरण कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें। इस समय ‘पिछले वर्ष हम साधना में कहां अल्प पडे’, ‘हमने श्री गुरुदेव जी के सीख का प्रत्यक्ष रूप में कितना आचरण किया’, इसका भी अवलोकन कर उस पर चिंतन करें।’

संदर्भ : सनातन संस्था का ग्रंथ ‘त्यौहार, धार्मिक उत्सव एवं व्रत’

कु. कृतिका खत्री,
सनातन संस्था, दिल्ली,
संपर्क – 99902 27769