नैनीताल। उत्तराखंड के चर्चित हल्द्वानी हिंसा मामले में आरोपी अब्दुल मोइद ने एक बार फिर नैनीताल हाईकोर्ट का रुख किया है। अब्दुल मलिक के बेटे मोइद ने सत्र अदालत की ओर से उसके खिलाफ आरोप तय किए जाने के आदेश को चुनौती देते हुए याचिका दायर की है। शुक्रवार को हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई नहीं हो सकी। अब प्रकरण की सुनवाई नई पीठ के समक्ष होगी।
अब्दुल मोइद के खिलाफ हल्द्वानी के बनभूलपुरा हिंसा मामले में तीन अलग-अलग मुकदमे दर्ज हैं। इनमें गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए के तहत दर्ज मामला भी शामिल है। फिलहाल निचली अदालत में उसके खिलाफ मुकदमे की कार्यवाही चल रही है।
आरोप तय करने के फैसले को दी चुनौती
याचिका में अब्दुल मोइद ने सत्र न्यायालय के उस आदेश पर सवाल उठाए हैं, जिसके तहत उसके खिलाफ आरोप निर्धारित किए गए हैं। उसने आरोप तय करने की प्रक्रिया और अभियोजन पक्ष की ओर से प्रस्तुत साक्ष्यों को चुनौती दी है। याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट से निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप करने की मांग की गई है।
शुक्रवार को निर्धारित सुनवाई नहीं हो पाने के कारण मामले में फिलहाल कोई न्यायिक निर्णय नहीं हुआ है। अब नई पीठ के समक्ष याचिका पर सुनवाई होने के बाद ही आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।
8 फरवरी 2024 को भड़की थी हिंसा
गौरतलब है कि हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में 8 फरवरी 2024 को अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान हिंसा भड़क गई थी। इस दौरान पुलिस और प्रशासनिक टीमों पर पथराव, आगजनी तथा पेट्रोल बम से हमले की घटनाएं हुई थीं। कई सरकारी और निजी वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया था। घटना में पुलिसकर्मियों और प्रशासनिक कर्मचारियों सहित कई लोग घायल हुए थे।
इस मामले में पुलिस ने कई मुकदमे दर्ज कर बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया था। जांच के दौरान अब्दुल मलिक और उसके बेटे अब्दुल मोइद पर हिंसा की साजिश में शामिल होने के आरोप लगाए गए। हालांकि, ये अभियोजन पक्ष के आरोप हैं, जिनका परीक्षण अदालत में होना है।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है मामला
हल्द्वानी हिंसा प्रकरण में अब्दुल मलिक और अब्दुल मोइद की जमानत को लेकर भी लंबी कानूनी लड़ाई चली है। अप्रैल 2026 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अब्दुल मलिक को जमानत दी थी। इसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के जमानत आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने इस मामले में यूएपीए लगाए जाने के आधार पर भी सवाल उठाए थे।



