हे राजन, अब मैं मेरा कर्म कर रहा हूं…

सबगुरु न्यूज। सत्ता के संघर्ष में ढाल, तलवार और शक्ति ही फैसला करतीं हैं। रियासत बड़ी हो या छोटी, इस बात का कोई फर्क नहीं होता है। मजबूत ढाल शत्रुओं से आत्म रक्षा करती है और तलवार शत्रु का वध करती है लेकिन इन दोनों के लिए ही मानव में शक्ति बल होना ही मुख्य बात होती हैं।

बहुत जल्द ही ये तीनों अपार जन धन की क्षति करती हुई बलशाली के पक्ष में विजय की घोषणा करती है। महाभारत जैसे महायुद्ध केवल कुछ ही दिनों में निपट गए और अपार धन जन की क्षति कर गए। राजतंत्र में ऐसा ही होता था।

ये ढाल तलवार और शक्ति सत्ता पर आसीन होकर अपने रूप और कर्म का रूख़ बदल लेती थी और एक स्थायी ओर आदर्श व्यवस्था पर ध्यान देकर उस संन्यासी की तरह हो जातीं थी जिसके हाथ में दंड, कमडंल ओर कम्बल है।

कंलिग के युद्ध में जब सम्राट अशोक ने विजय तो पा ली और उसके बाद अपार धन जन की क्षति को देखने गए तो वहां एक सन्यासी घायल सैनिकों की सेवा अपने शिष्यों से करवा रहे थे। यह देखकर सम्राट अशोक ने पूछा कि आप ये क्या कर रहे हैं। यह बात सुनकर संन्यासी बोला हे राजन आप ने अपना कर्म कर लिया अब में मेरा कर्म कर रहा हूं।

सम्राट अशोक का दिल भर गया और मानव की सेवा करने के लिए खुद प्रजा के लिए ढाल बन गया, कल्याण रूपी तलवार से वार कर जन कल्याण का मसौदा तैयार कर प्रजा के लिए हर क्षेत्र में सुख साधन सुविधा को पहुंचा दिया। अपनी शक्ति को सेवा में समर्पित कर दिया।

ढाल, तलवार और शक्ति का यह कल्याणकारी रूप ही सत्ता को संघर्ष से बचाता है और वह राज्य को एक आदर्श और गौरवशाली बनाता है। सत्ता चाहे राज तंत्र की हो या प्रजातंत्र की सभी की यही कहानी होती हैं। ढाल रूपी नीति विकास रूपी तलवार और शक्ति रूपी सहयोग व समाधान ही प्रजातंत्र को एक आदर्श रूप दे सकतीं हैं और सत्ता को जमाए रखती है।

संत जन कहते हैं कि हे मानव तू निर्बल और असहाय की ढाल बन कर रक्षा कर और तलवार रूपी वाणी में मधुरता ला तथा तेरी शक्ति से संसाधन बना ताकि अपार जन धन को एक राह मिले ओर इन सबसे तुझे राहत मिले।

इसलिए हे मानव तू इस ढाल तलवार और शक्ति का सदुपयोग कर, जो तेरे कर्म के अस्त्र शस्त्र हैं। इसी से तेरी गुप्त शक्ति प्रकट होगी और तू सब का मसीहा बन कर सिद्ध हो जाएगा, ये गुप्त नवरात्रा सफल हो जाएगा।

सौजन्य : भंवरलाल