गए थे रोशन करने जहां, आग लगा बैठे

सबगुरु न्यूज। उस तूफान में भी दीपक जलता रहा। यह देख तूफान भी उससे ख़फा हो गया और बोला, हे नादान मुझे ईज्जत बख्श, मेरे अस्तित्व को बना रहने दे, अंधेरों की तरह तू भी मेरा दुश्मन मत बन। मै जानता हूं, अंधेरों का तू भारी दुश्मन है और अंधेरे तूझे छू भी नहीं सकते।

मै तूफान हूं, मेरे सामने तू बुझ जा नहीं तो मैं तेरे अस्तित्व को मिटा दूंगा। दीपक कुछ ना बोला ओर जलता ही रहा। तूफान समझ गया कि ये दीपक ‘मायावी आग’ हैं और दुनिया को नई रोशनी देने के बहाने यह सर्वत्र शनै शनै आग लगा रहा है और मानव सभ्यता और संस्कृति को विनाश की ओर ले जा रहा है।

जमीनी हकीकत भी कुछ इस तरह की होती है कि दुनिया में कई बार ऐसे व्यक्तित्व प्रकट हो कर आते हैं कि जिनकी हरकतों से लगता है कि ये इस दुनिया को बदल देंगे ओर धरती की दस दिशाओं को छोड़ ये ग्यारहवीं दिशा की ओर ले जाएंगे। धार्मिक अवतारों तक तो ये सब कुछ होता आया है पर हकीकत की दुनिया इससे विपरीत रही।

तूफानों में जलने वाले दीपक वास्तव में हकीकत नहीं, ये घृणा के तेल से भरे रहते हैं और उसमें जलन की बत्ती बिना आग के ही स्वयं जलती रहती है।

दुनिया के प्रचंड तूफान और हवाओं में वे ज्यादा तेजी से जलकर सर्वत्र रोशनी देने के बहाने आगे बढ़ जाते हैं और फिर उन तूफानों के सहारे सर्वत्र आग लगा देते हैं। इसके बाद दुनिया को अपना रूप दिखा कर साबित कर देते हैं कि हम तूफानों में भी जलकर रोशनी देने नहीं वरन आग लगाकर हमारा व्यक्तित्व दिखाने आए हैं।

ग्यारहवीं दिशा के सपने मे ‘चारों सम्पतियां’ ही नहीं आठ सिद्धियां और नौ निधिया भी गुमराह होकर लाठी भाटा जंग के जंगली युद्ध करने लग जाती है और ये सब ग्यारहवीं दिशा में जाने के लिए बेताब हो जाती हैं।

वास्तव में यह सब वास्तु शास्त्र के उस सिद्धांतों में खो जाते हैं कि हम ईशान कोण में मंदिर बनाकर घर की ऊर्जा बढाकर सुखी और समृद्ध हो जाएंगे जबकि वे भूल जाते हैं कि पृथ्वी स्थिर नहीं है, सदा गतिशील है और ईशान मे बना मंदिर केवल उस दिशा मे दो घंटे ही रहता है।

‘मायावी दीपक’ तो उन कौओं की तरह होते है जिनका महत्व तो केवल श्राद्ध पक्ष तक भी होता है। बाद में वे कौवे यदि सिर पर बैठ जाए तो उसे शकुन शास्त्र में अपशगुन मानते हैं। इसलिए हे मानव तू अपने मन का दीपक जला और अपने तूफानी विचारों से बुझने ना दे अन्यथा मन में जलन की आग से तू, दूसरों को तो जला देगा पर तू खुद भी उस में जल जाएगा।

इसलिए हे मानव तू किसी भी दिशा में रह पर मन की भावना के शुद्ध दीपक जला और परमात्मा के सदा गुणगान कर फिर तेरे सिर पर कौवा बैठकर भी पछताएगा।

साभार : भंवरलाल