ये कैसी फ़ितरत है दुश्मन से वफा की

सबगुरु न्यूज। दुश्मन से वफा की फितरत सदा जनाजे ही उठाती है और उस सोच से नगर बस्ती गांव मुर्दों के डेरे बन जाते हैं और वहां सदा ही भूतियां ढाह छाया रहता है। सोतियां ढाह में सौतनें अपनी संतान के लिए असंभव को संभव बनाने की कवायद करती है। भूतियां ढाह सदा जिन्दों की बस्ती को मुर्दों के डेरे बना में जुटा रहता है क्योंकि मुर्दे उनकी अंतिम संतान होती हैं।जिंदगी भूतों की सौतन होती है और सदा भूतों को भगाने में जुटी रहती है। 

जो भूतियां ढाह दुश्मन बनकर मुर्दों के डेरे बनाना चाहता है और उससे वफा की उम्मीद का नतीजा खुद का एक आत्मसमर्पण होता है। भले ही उस भूतियां ढाह को धोखेबाज कहो। लेकिन यहां फितरतों के मंसूबे ही धोखा खातें हैं क्योंकि इन मंसूबों में कोई प्रेम छिपा हुआ होता है इसलिए फितरते भी उसी राह की ओर बढ जाती हैं।

“प्रेमी” फकीर से भी बड़ा त्यागी होता है। अपना सब कुछ लूट जाने के बाद भी उसकी जुबां पर अपनी लैला का ही नाम होता है। प्रेमी की यही फ़ितरत फिर जनाजे उठने की चिंता नहीं करती। भले ही प्रेम के दुश्मन और लैला एक ही खेमे में बैठकर उस प्रेमी की फितरत वफा चाहने की देख कर मुस्करा रहे हो। यही एक तरफा प्रेम का हश्र होता है और भूतियां ढाह जीत जाता है भले ही रात के अंधेरों में भूतो को उस महकती लोबन की खुशबू से भगा दिया हो पर भूत भाग जाता है पर मरता नहीं।

संत जन कहते है कि हे मानव श्री कृष्ण महाभारत के महायुद्ध में समझाते हैं कि हे अर्जुन जो अपना दुश्मन हो उसे वफा की आशा नहीं रखी जाती है। विजय के लिए भले ही दुश्मन को धोखा देना पडे तो उस मार्ग की ओर बढ जाने में ही विजय हो सकती है और ये ही मैदाने जंग का उसूल होता है।

इसलिए हे पार्थ जब जीवन में राज सुख वैभव पाने के लिए अपने प्रतिद्वंदियों को जब हर तरह से नीचे गिरा कर हराने की नीति तुम काम में लेते हो जबकि वह आपका दुश्मन नहीं केवल प्रतिद्वंदी है और युद्ध के मैदान में अपनें दुश्मनों से वफा की फितरत रखना कितनी जायज है उसका हश्र भी तुम्हारी फितरत का नतीजा होगा।

सौजन्य : भंवरलाल