जीवन के रस में डूबने से जाता है मन का फेर

सबगुरु न्यूज। जिसने जीवन के रस के सच को ना जाना वह परमात्मा के रस में खोने का मार्ग दिखाता है और मानव कल्याण के उस मार्ग की ओर संकेत करता है जहां मानव को परमात्मा नहीं शैतान सामने खडा नजर आता है जो अपने आगोश में दबा कर तुरंत अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए धर्म राज का जामा पहन कर बैठा है।

मन का फेर जब तक नहीं बदलेगा तब तक परमात्मा तो दूर मानव भी नजर नहीं आएगा। बिना जीवन के रस को जाने कोई मानव मानव में भी समाहित नहीं हो सकता है।

जब तक मन में सतत सक्रिय सकारात्मकता नहीं आएंगी तब तक किसी भी उदेश्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता है और वह उदेश्य एक कागज की योजना की तरह बेजान ही पडा रह जाएगा। मन की नकारात्मक सोच जब तक नहीं बदलेगी तो वह उस प्रयास के समान होगी जहां मित्रता के हाथों में तो बंधे हुए हैं पर केवल अपनें हितों को साधने के लिए ही, उनमें मित्रता के भाव नहीं है क्योंकि उनके मन का फेर अभी बदला नहीं है।

जब तक मन का फेर नहीं बदलेगा तब तक किसी भी बुराइयों का अंत नहीं होगा। भले ही कानून कायदे इसके अंत के लिए बन जाएं। हर बुराई इसलिए ही सदियों से आज तक समस्त विश्व स्तर पर पर अपना प्रभाव डालकर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक तथा धार्मिक व्यवस्थाओं पर अपना लगातार प्रहार कर रही है।

असुरक्षित महसूस करता मानव, पेट भरने के लिए जूझता मानव, धर्म, जाति, समाज, समुदाय, भाषा, लिंग सभी क्षेत्रों में अपने अस्तित्व को जिन्दा रखने के लिए मानव को कितना पीड़ित होना पड़ता है यह जग जाहिर है और इस हेतु मानव संरक्षण के हर मिशन नगण्य ही साबित हो रहे हैं।

हर शक्तिशाली दुर्बल को सरेआम खत्म कर रहा है तो हर बडी व्यवस्था के तामझाम छोटी व्यवस्था की सच्चाई को निगले जा रही है। हर कोई अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए सबको गले लगा रहा है और पीठ पर खंजर डाल रहा है।

सोने की कलम अब जवाहरात की स्याही से अल्फ़ाज को लिख कर हकीकत की स्याही को मिटाने के खेल में पारंगत होती जा रही है। इतना ही नहीं बल्कि चमकते जवाहरात की स्याही रोशनी डाल डालकर झूठी सत्यता को दिखाने में जी जान लगा रहीं हैं और उन व्यवस्थाओं के साथ क़दम ताल कर रही है क्योंकि मन का फेर सकारात्मक के चोले को छोड़ नकारात्मकता के चोले पर मंचन कर रहा है।

सौजन्य : भंवरलाल