रूहानियत की बांसुरी से प्रेम की धुन बजाता ‘फकीर’

सबगुरु न्यूज। फकीर शब्द बडा आसान पर होता है लेकिन उसके मायने पकड़ से बहुत दूर होते हैं। साधनों से अभाव हीन और कंधे पर झोला लटकाकर सर्वत्र फेरी लगाते दिखने वाले फकीर के मायने की थाह लेना सहज नहीं।

परमात्मा का नाम और उसकी दुनिया की धरोहर को संरक्षित, सुरक्षित व संजोए रखने के लिए सदा प्रयास करने वाला, जीव व जगत के कल्याण के लिए खुद को झोंक देने वाला, अटूट धैर्यवान और त्याग की मूरत होता है फकीर। फकीर का ताल्लुक धर्म से नहीं बल्कि रूहानियत से होता है, जो दिखाई नहीं देता हैं पर इस सृष्टि का परम अध्यक्ष है।

नियम संयम क़ानून कायदे में रहकर, हद की सीमा से जो परे नहीं जाता और जो मानव कल्याण के लिए अपने भौतिक सुख साधनों को न्यौछावर कर देता है तथा उनके लिए अपना जीवन भी कुरबान कर देता है वही फकीर कहलाता है।

इतना ही नहीं, वह रूहानियत के आकाशीय बादशाह की खिदमत में इतना दीवाना हो जाता है कि जैसे किसी मजनूं को बरसों बाद अपनी लैला के दीदार हो जाए तो वह उसे देख अपने को भूल जाता है और बरसों तक उसे होश नहीं आता है। इसी तरह फकीर भी अपने परमात्मा की झलक में खोया रहकर भौतिक जगत की सीमा को छोड़कर अभौतिक जगत में चला जाता है जहां वह और उसके परमात्मा की रूहानियत के सिवा कुछ भी नहीं होता है। ऐसे लगता है कि लैला और मजनूं अपने मिलन के आनंद में उस रेगिस्तानी धरा में समाधिस्थ हो गए हैं।

संत जन कहते हैं कि हे मानव, फकीर वहीं कहा जाता है जो मानव सभ्यता और संस्कृति की हद में रहकर भोतिक कल्याण की सीख देने वाला तथा अभौतिक कल्याण के लिए बेहद तक त्याग, तपस्या करते हुए मानव को संदेश देकर अलख जगाने वाला हो। फकीर प्रेम रूपी रस में विचार रूपी सैवया को भिगोकर एकता के पैगाम को देकर ईद रूपी उत्साह को मनाता है वही फकीर कहा जाता है।

इसलिए हे मानव तू प्रेम एकता और आपसी सहयोग, समन्वय को बढाकर सामूहिकता का परिचय दे। मन के उत्साह को बढा और चार दिन की हौसला अफजाई के नाश्ते व एक दिन के मिलन के बजाय हर दिन को मिलन की, बेहतरीन ईद के उत्सव की तरह मना।

सौजन्य : भंवरलाल