कल्याण के डेरे पर मंडराते कलंक के साये

सबगुरु न्यूज। सभ्यता और संस्कृति को सदा ही उन खेलों का सामना करना पड़ता है जहां व्यक्ति धर्म, राजनीति, जाति, वर्ग, ऊंच नीच के रक्त रंजित खेल से एक दूसरे का शत्रु बन कर ईर्ष्या, जलन व कुंठा की आग से अपनी जीत हासिल करने के लिए कल्याण के डेरों पर कलंक लगाने से भी नहीं चूका साथ ही उन कल्याणकारी डेरों को मिटाने में कसर नहीं छोड़ी।

जब तक ये डेरे प्रतिस्पर्धियों के स्वार्थ साधते रहे तो सिर आंखों पर बैठाकर इनका गुणगान किया गया तथा स्वार्थ की पूर्ति ना होने पर उन्होंने गंदे और घिनौने खेलों को रचकर उन डेरों पर कलंक की कालिख पोतकर उन्हें हर तरह से नीचे गिराने की साजिश रची। उनके अस्तित्व को मिटाने के लिए हर तरह से भरसक प्रयास किए।

संत जन कहते हैं कि हे मानव, कल्याण के सागर अग्नि बाणों से सूख जाते हैं और वो एक मिसाल बनकर रह जाते हैं जिन्हें हम सभ्यता और सुन्दर संस्कृति के इतिहास के पन्नों में खंगालते रहते हैं जो एक आदर्श ढांचे के रूप में मानव कल्याण के अप्रतिम मसौदे थे।

इन दस्तावेज के लक्ष्य को जब साधने का प्रयास किया जाता तो जमीनी स्तर पर सब कुछ लुटाना पडता है। जब इन खुदे हुए गड्डों को कोई भरने के लिए जूझता मानव अपना सब कुछ लुटा कर इन्हें सदियों तक अथक प्रयास कर भर देता है तो जीव व जगत के कल्याण के सागर बन जाते थे और लाखों लोगों के आस्था के केन्द्र बनकर जीव व जगत का पालन करते थे।

ईर्ष्या व जलन के अग्नि बाणों से सदा ही कल्याण के सागर सूख गए ओर कल्याण के डेरों पर कलंक के सायो ने उन कल्याणकारी के कालिख पोत दी।

इसलिए हे मानव, तू अब इन सब कल्याणकारी डेरो से दूर, बहुत दूर चला जा तथा आत्मा के कल्याण के लिए मन को निर्लिप्त बनाकर शरीर में मिला ले ओर उस ध्यान की तरफ बढ़ जा जहां शरीर की ऊर्जा एकत्रित होकर मन के हर रोग को स्वस्थ कर देगी, यही योग तुझे स्वस्थ और सुंदर बना देगा।

सौजन्य : भंवरलाल