मेरे घर प्रसाद ग्रहण करो परमात्मा

सबगुरु न्यूज। किसी भी सभ्यता और संस्कृति मे विश्वास मान्यताएं और धर्म ही व्यवस्थाओं की प्रकृति को निर्धारित करतीं हैं ओर उनकी सरलता व उनकी क्लिष्टता ही विकास की ऊचाईयां को तय करती हैं। अर्थात जहां भी धर्म, मान्यताएं और विश्वास सरल प्रकृति के होंगे वहां विकास ऊचाईयां को जल्द हासिल कर लेगा और जहां क्लिष्टता होगी वहां विकास की यात्रा में बहुत सारे अवरोधक आ जाएंगे और अरमानों की उपलब्धियां की किश्ती मझधार में नहीं उससे पहले ही डूबने लग जाएगी।

मानव चूंकि हर व्यव्स्था से जुडा है और उसकी पहली प्राथमिकता विश्वास, धर्म, मान्यताएं व समाज ही होता है और वह सदा उनके अनुरूप व्यवहार करता है और तदनुसार ही अपने कार्यो को अंजाम देने की कवायद करता है। केवल बहुत कम प्रतिशत लोग ही इस मान्यताओं से दूर रहते हैं और वे प्रकृति के रहस्यों को समझने में लग उस ओर बढ जाते हैं।

उनकी मान्यताएं धर्म और विश्वास का नजरिया केवल कर्म ही रह जाता है और वे ही विकास के हर क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर देश व दुनिया में को महत्वपूर्ण योगदान देकर क्लिष्टता को पीछे छोड़ देते हैं। उनकी यही मान्यताएं विश्वास और धर्म सरल बनकर मानव कल्याण में लग जाता है और परमात्मा स्वयं उनके घर मानव रूप में पीडा लेकर पहुंच जाता है और पीडा को दूर करवाने के लिए भोजन करने बैठ जाता है।

जमीनी हकीकत भी यही होती है कि व्यवस्था में किलिष्टा हर व्यवस्था को चौपट करके रख देती हैं और ऐसा योजनाकार फ़ेल होकर व्यवस्था से ही किनारा कर लेता है और समझ जाता है कि यहां पर हर योजना विश्वास, धर्म, मान्यताओं को व्यवस्थाएं अपने अनुसार ही लागू करने के आदेश देती हैं और योजना के दर्शन तथा तार्किकता को दफ़न कर देती हैं।

व्यवस्था यहां, चाहे सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक और वैज्ञानिक ही क्यों न हो वे सब जहां जहां भारी होती हैं वे योजना को अपने अपने तरीकों से ही स्थापित करती है व योजना के रेखाचित्र से बनने वाले उस सुंदर भवन को बेतरतीब बना कर रख देती हैं। विकास की ऊचाईयां से एकदम नीचे गिर जाती हैं और मानव रूपी परमात्मा उनके घर में जाकर भी बिना प्रसाद ग्रहण कर के चला जाता है।

संत जन कहते हैं कि हे मानव सिद्धांतों की सरलता ही और योजना को विकास की चरम सीमा पर ले जाती है व सिद्धांतों की क्लिष्टता मानव को उलझा कर रख देती है। परमात्मा रूपी मानव को भोजन कराने के लिए फिर जगह जगह भंडारे लगाए जाते हैं और वहां कुछ ही दिनों में कुछ ही लोगों को भोग अर्पण कर भंडारों को बंद कर दिया जाता है।

इसलिए हे मानव तेरे घर भीलनी की तरह बेर खाने श्रीराम नहीं आएंगे वरन तेरे मेहमान ही तुझे अपना बनाने के लिए आएंगे। इसलिए हे मानव तू हर सोच से बाहर निकल तेरे भोजन के लिए मानव रूपी परमात्मा दर दर भटक रहा है तू उन्हें भोजन करा। भले ही तेरा मोक्ष न हो पर मानव सेवा से तेरा मन तृप्त हो जाएगा और तुझे जीते जी मोक्ष मिल जाएगा।

सौजन्य : भंवरलाल