नेकी की झोलियों में नीति और नीयत

सबगुरु न्यूज। मुरादों की झोलियां भर भरकर ले जाते हैं वे लोग जिनके दिल में वफ़ा की धड़कनें धड़कती हैं। उन पर फेंका गया हर पत्थर भी फूल बनकर उनकी हिफाज़त करता है। यदि दिल में वफा ना हो तो सम्मान में फेंका गया हर फूल भी पत्थर बन जाता है और वह लहुलहान कर अपनी नीयत का बयान कर जाता है।

बेवफ़ाई के मेलों में रंजोगम के बाजार होते हैं वहां हर शमां परवाने को जला देती है और हर सवाल बुझी शमा के धुएं से उठते रहते हैं और हर शाम शमां रोशन होकर भी पतंगों को लाश बनाकर अपना जबाब देती है तथा रोशनी की जगह आग लगा देती है।

वास्तव में यही बेवफाई की दौलत होती है जो वफाई को औंधे मुंह पटककर उसे अंधेरी रात में पानी से दिए जलाने के लिए छोड़ देती है।

वफाई के बाजार तो पानी में भी आग लगा देते हैं जहां शमां मल मलकर हाथों से परवाने की लाश के दागों को धोती है। शमां के हाथ तो धुल जाते हैं पर लाश की राख़ हाथों पर हीना की तरह अपने निशान छोड़ जाते हैं।

किसी कार्य को अंजाम देने के लिए श्रम पर लगाया व्यक्ति जब अधूरे कार्य की ही पूरी मजदूरी ले जाता है और दूसरे दिन फिर काम पूरा करने के श्रम की मजदूरी की बात करता है तो यह कदम अर्थशास्त्र को दिवालिया बनाकर अर्थ व्यवस्था का ढांचा जर्जरित कर देता है तथा उस बाजार में उत्पाद की लागत बढा देता है जिसे कोई भी वयक्ति नहीं खरीदता है। सर्वत्र बाजार में उत्पाद बढ जाता है और खरीद दार के आने तक वह उत्पाद नष्ट हो कर खत्म हो जाता है।

संत जन कहते हैं कि हे मानव यह उलझी हुई समीकरण नीति और नीयत को बयां करती है। लक्ष्य हासिल करने की नीति व नीयत जब केवल सपनों की महबूबा की तरह होती है जो रात के खयालों में बसी रहती है। जमीनी हकीकत में महबूब और महबूबा नहीं होते फिर भी प्रेम कहानी के गीतों की आवाजे आती रहतीं हैं। यह सब उस बेबफाई के बाजार की तरह होते हैं, जहां केवल आरोप ही बिकने के लिए आते हैं।

इसलिए हे मानव जब नीति व नीयत ठीक होती है तो कदम को रोकने वाले पत्थर भी फूल बन जाते हैं अन्यथा बदनीयत की नीति फूलों की राहों पर कांटों को बिछा देती है। इसलिए हे मानव तू नेकी की झोली में नीति और नीयत को पाक साफ रख।

सौजन्य : भंवरलाल