चार युग चार पीढ़ियों की तरह निकल गए

सबगुरु न्यूज। काल बेला आगे बढ़ती रही और अपने पीछे उन इतिहास को छोड़ गई जिन्हें देख हर विज्ञान अपने अपने तरीके से सभ्यता व संस्कृति के युगो की कहानियां लिखता रहा तथा अपने अपने प्रमाण देता रहा।

धर्म व साहित्यों के चार युगों की कहानियां और उनका लेखा जोखा आज भी ऐसा लगता है कि ये चार युग चार पीढ़ियों की तरह निकल गए और आज का मानव उस हिसाब किताब में बहुत ही नीचे रह गया।

एक शव को अपने कंधे पर डाल कर ले जाते हुए चार युगों की चार पीढ़ियों के मानव बारी बारी से उस शव को अपने कालक्रम के लेखों का हिसाब किताब सुनाने लगे ताकि इस शव की अंतिम यात्रा सुखद ढंग से पूरी हो जाए।

शव को अपनी पीढियों की उपलब्धि व स्वयं की स्थिति का भान हो जाए। राम नाम सत्य की ध्वनियां सुनाई आती रही और चार युग चार पीढ़ियों बन उस शव को अपना हिसाब किताब सुनाते रहे।

शव को कंधा देता पहला व्यक्ति बोला कि हे शव मेरी पीढ़ी ने मानव को रहना सिखाया। सत्य, पाप पुण्य, श्रद्धा, मूल्य, विश्वास, मान्यताओं को स्थापित कर प्रकृति से प्रेम करना सिखाकर जीवन के मार्ग की ओर बढाया।

मै सतयुग हूं और सति का शिव प्रेम और शिव के महान योगदान को मैंने देखा तथा उसका अनुसरण कर सब कुछ अगले युग की अगली पीढ़ी के लिए छोड़ गया ताकि वो मेरे कर्म के हिसाब किताब को पढ़ते रहें और मेरा मूल्यांकन करते रहें।

शव को कंधा देता दूसरा व्यक्ति बोला हे शव मैने अपने पूर्वजों के इस महान योगदान में त्याग, तपस्या और बलिदान कर समाज में आदर्श स्थापित किया। मै त्रेता युग हू और अपने काल में मैने दानवीर राजा हरिश्चंद्र ओर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को देखा।

शव को कंधा देता तीसरा व्यक्ति बोला मैं द्वापर हूं। इस दुनिया को भारी तकनीक योग के रूप में मैंने ही दी हैं व मैंने ही महान् ज्ञान देकर इस सभ्यता और संस्कृति को आगे बढाया तथा ज्ञान व शक्ति का दीपक जला कर चला गया। मेरे ही युग में श्री कृष्ण हुए।

शव को कंधा देता चौथा व्यक्ति बोला कि हे शव मैं कलयुग हूं और तीनों युगों की तीन पीढ़ियों के बल पर मैं दुनिया को नचाने लग गया तथा मैने अपने पूर्वजों की विरासत को संजोये रखने के लिए हर वह कदम उठाया और दुनिया में मैं बहुत आगे निकल गया।

हे शव तू हमसे बहुत बाद में आया है और तू कुछ भी नहीं कर पा रहा है क्योंकि कलयुग की आधारशिला मैने रखी है और तू तो उसे अभी तक समझ नहीं पाया है। बस तू अपने अपने पूर्वजों की वसीयत को अपने नाम चढा कर यूं ही अपने आप को पूजवाने की कवायद में जुटा हुआ है।

इतने में श्मशान आ गया ओर चारों शव को छोड़ अपना लेखा जोखा बता चारों दिशाओ की ओर चले गए। संत जन कहते हैं कि हे मानव वास्तव में चार युग चार पीढ़ियों की तरह निकल गए और इस कारण आज भी हम श्रद्धा ओर आस्था से उन युगों के योगदान को उत्सव की तरह मनाते हैं।

इसलिए हे मानव तू अपने पूर्वजों की विरासत को संजोये रखने के लिए तथा उसके संवर्धन तथा सुरक्षित रखने के लिए ही कार्य कर तथा अपनी उपलब्धियों को दुनिया के सामने रख ताकि तेरा मूल्यांकन हो सके ओर तू भी अपने अस्तित्व को जिन्दा रख सके।

सौजन्य: भंवरलाल