आंसूओं ढेर में सावन की विदाई

सबगुरु न्यूज। बाढ़ तो बरसात से ही आती है, पानी का छिड़काव तो केवल सांत्वना ही देता है। सांप की केंचुली में जहर नहीं होता है फिर भी केंचुली यह एहसास कराती है कि यहां सांप आया था और अपने शरीर पर चढे बोझ को यहां छोड़ गया।

अंधविश्वास केंचुली के मेले लगवा कर उसे पूजवाने लगता है और मन्नत के धागे बंधवाकर मनोकामना पूर्ण होने के आशीर्वाद लेने में लग जाता है।

यह हाल देख कर सावन मास की आंखों में आंसू छलक जाते हैं क्योंकि वह अपने पीछे बर्बादियों के मंज़र छोड़ जाता है और दुनिया केवल अपनें स्वार्थ के मेलों को भरवाने में ही लग जाती है।

सावन हरियाली तो फैला जाता है, दुनिया की झोलियां भर जाता है लेकिन कई जगह वह झोलियां में तबाही बर्बादी और लाशों को छोड़ जाता है और जो बच जाते हैं वे जिन्दा लाशों की तरह इधर उधर अपनों की लाशों को कंधे पर डाल कर तूफान में खोये हुए शमशान की तलाश करते रहते हैं।

अपने काल से विदाई लेता हुआ सावन मास अपनी आखों में आंसू लेकर बचे हुए को मजबूत रक्षा का सूत्र बंधवाने के लिए छोड़ जाता है। इन रक्षा सूत्रों से हम की भावना का उदय होता है और भावी संकट में वे एक होकर आने वाले तूफानों से लोहा ले सकें और अपने विश्वास के धागों की लाज बचा सके।

संत जन कहतें है कि हे मानव मन्नत के धागे तो फिर भी सफल नहीं हो पाते पर विश्वास के धागों से बिखेर हुए लोग एक हो जाते हैं और वे अपने ही अस्त्र शस्त्र से सफल हो जाते हैं।

इसलिए हे मानव तू तबाही और बरबादी पर आंसू मत बहा तथा स्वयं को ही मजबूत बनाकर आगे बढ़ क्योंकि दूसरों के अस्त्र शस्त्र से लडने वाला ज्यादा सफल नहीं हो सकता है क्योंकि उन अस्त्र शस्त्र की संस्कृति में अपने अस्त्र शस्त्र बे मार्गी हो जाते हैं।

सौजन्य : ज्योतिषाचार्य भंवरलाल, जो​गणियाधाम पुष्कर