शाखा वृक्ष की थीं जो दरारें डालने लगी

सबगुरु नयूज। वक़्त और हालातों की ठोकरें खाता वृक्ष जब मजबूत होने लग जाता है तो उसकी शाखाएं बेरहमी से अपना रंग रूप और आकार विकराल कर सर्वत्र उन दिशाओं की ओर बढ़ जातीं हैं जहां पर गर्म हवा, लू और आंधी तूफानों ने उस वृक्ष को न तो पनपने दिया और न ही वृक्ष की शाखाओं को हैसियत और हद से आगे नहीं बढने दिया।

मौसम की अनुकूलता से जब वृक्ष भारी होने लगता है तो वह अपनी शाखाओं का विस्तार कर अपने अस्तित्व का भान कराने के लिए गांव, बस्ती, नगर में अपनी शाखाओं से सभी भवनों में दरारें डालना शुरू कर देता है।

बढ़ती शाखाएं भवनों की नीव में घुसकर शनै: शनै: भवनों में दरारें डाल भवन को गिराने की कवायद में लग जाती है। वृक्ष की हरकतों को तूल देती हवाएं बेरहमी से दरारें बढाने में शाखाओं को उतेजित करती है। दरारें बढ़ने लग जाती है और भवन ढहने लगते हैं। भवन में दबे कुछ लोग काल के गाल में समा जाते हैं और कुछ लहुलहान होकर बाहर निकल चीख़ पुकार करते हैं।

वृक्ष माहौल में कुछ अपना रंग जमाने के लिए जहांगीरी फरमान से व्यापार के बदले राज करने की कवायद करता है तो अचानक तूफानी बंबडर आ जाता है और समूची धरती को भयानक ढंग से हिला उस वृक्ष को जड सहित उखाड़ फेंकता है। उसके आसपास के भवनों को भी जमीदोज कर देता है।

रक्त रंजित उस भूमि पर पडे घायलों को फिर सांत्वना की हवाएं मरहम लगाकर नवजीवन देती हैं और तब तक विशाल वृक्ष ओर उसकी शाखाओं के टुकड़े हो जाते हैं और उन्हे जलाने योग्य समझकर लोग अलाव कर सर्दी में राहत पाते हैं और वृक्ष और उसकी शाखाओं का आस्तित्व समाप्त हो जाता है।

संत जन कहते हैं कि ये मानव जब कल्याणकारी उद्देश्य को लेकर व्यक्ति अपना एक शक्तिशाली समूह तैयार कर लेता है और कल्याण के स्थान पर विध्वंसक इरादों वाला बन जाता है तो वह शीघ्र ही उस घने ओर काले बादल जैसा बन जाता है जो बरसता नहीं केवल गरजता रहता है और बिजली की कडकडाहट की तरह सर्वत्र भय बनाकर उमस बढाता रहता है।

आखिरकार कुदरत की तेज रफ़्तार की हवाएं उन घने बादलों से टकराकर उनके जल को बरसा देती हैं और घने बादलों का अस्तित्व मिटा देतीं हैं और सर्वत्र प्रदूषण की धुंध हट जातीं हैं और आम-जन सूखी हो जाता है। इसलिए हे मानव तू विशालता में झुकना सीख और सबके लिए कल्याणकारी बन, यही प्रकृति का यही गीता ज्ञान हैं।

सौजन्य : भंवरलाल