टूटने लगे जब मन्नतों के धागे

सबगुरु न्यूज। बांधे गए मन्नतों के धागे सदा मुराद पूरी नहीं करते। मन्नतों के धागे जहां बांधे जाते हैं वे आस्था के ठिकाने व्यापार नहीं करते बल्कि जमीन पर चलना सिखाते हैं। मन्नतों की अति कर बांधे गए धागे अंत में मन्नत पूरी होने के पहले ही टूट जाते हैं क्योंकि यह धागे कच्चे होते हैं। आस्था व श्रद्धाका सैलाब तो केवल समर्पण की भावना का होता है जहां मन्नतों का कोई स्थान नहीं होता है, वहां बिना मन्नतों के धागे बांधने के ही मन्नते पूरी हो जाती है।

स्वर्ग की दुनिया का बादशाह जब खुद मन्नतों के धागे बांधने लग जाता है तो यह स्वर्ग के कल्प वृक्ष का अपमान ही होगा क्योंकि स्वर्ग का कल्प वृक्ष तो स्वयं मन्नतें पूरी कर देता है लेकिन हर देव को देवराज नहीं बनने देता है। सदा देवराज बने रहने के लिए कल्प वृक्ष पर अमृत रूपी बरसात करनी पड़ती है। वरन् ये कल्प वृक्ष मन्नतों के धागों को तोड देते हैं और देवराज के स्वर्ग का शासन छीन लेते हैं।

स्वर्ग के शासन पर फिर काबिज होने के लिए देवराज जब शक्ति की शरण में जाते हैं तो शक्तियों गरज कर बोलतीं है कि स्वर्ग के सुखों का आनंद व वैभव प्राप्त करने के लिए तुम इतना क्यों गिडगिडा रहे हो राजन। तुम्हारी हरकतों से लगता है कि तुम बेपरवाह ही नहीं भारी स्वार्थी हो और सर्वत्र मन्नतों के धागे बांधने के लिए भटकते फिर रहे हो जबकि स्वर्ग के राज सिंहासन पर दैत्य राज बली कब्जा कर चुके हैं। अब सब कुछ बदल चुका है।

पौराणिक कथाओं के इतिहास बताते हैं कि अपने ही स्वर्ग में आग लगाकर देवराज ने शनै: शनै: सब कुछ खो दिया और मन्नतों के धागे टूटने लग गए। देव और दानवों की संस्कृति में मानव ने प्रवेश कर लिया।

संत जन कहते हैं कि हे मानव, कर्म के धागे ही मन्नतों की ओर ले जा सकते हैं, बिना कर्म के मन्नतों के धागे टूट जाते हैं और कर्म भी ऐसा जो जग हितकारी हो।

इसलिए हे मानव तू जगत कल्याण के लिए कर्म कर, तेरी मन्नतें पूरी हो जाएंगी अन्यथा आस्था और श्रद्धा के ठिकानों पर बांधे मन्नतों के धागे मन्नत पूरी होने के पहले ही टूट जाएंगे।

सौजन्य : ज्योतिषाचार्य भंवरलाल, जोगणियाधाम पुष्कर