लज्जा का चीर बढ़ाने फिर आएगा सांवरा

सबगुरु नयूज। आज लज्जा को चीखने ओर चिल्लाने का समय भी नहीं मिल रहा है और वो सदा के लिए मोन होकर इस दुनिया से लगातार विदाई ले रही है। वो धर्म कर्म आस्था विश्वास पाप पुण्य सभी एक आदर्श बन एक एक कर महान ग्रंथो में ही दबती जा रहीं हैं और इस दुनिया की भागम-भाग मे मानव लगातार एक दूसरे को कुचलता हुआ ओर धक्काधूम करता हुआ आगे निकलता जा रहा है।

काश! महिषासुर शुंभ निंशुभ रावण कंस भी होते तो, वो भी कांप जाते ओर सोच मे पड जाते कि इस दुनिया में आज जो कुछ हो रहा है उस सोच तक तो हम कभी पहुँचे नहीं ओर पापी अधर्मी होकर भी हम अपने कर्म के चयन के सिद्धांतों पर रहे।

आज कर्म चयन के सिद्धांत ओर उसी अनुरूप फल की प्राप्ति उस द्वापर के युग तक ही रह गयीं है और हर पाप पुण्य धर्म कर्म पर परमात्मा न्याय करता है एक किताबों में आदर्श की तरह ही दबता जा रहा है और ‘सत्य की ही विजय होती है’।

एक दिलासा दिलवाने के लिए ही सांत्वना पुरस्कार की तरह रह गया है। यह उन्ही तक सीमित है जो आस्था ओर श्रद्धा के पुजारी हैं और अंत मे बिना सत्य की विजय को देखे उनकी राम नाम सत्य के नाम से ही अंतिम विदाई कर दी जाती हैं।

शमशानी बैराग की जगह उन शमशानो मे से अब उन मृत देह की हड्डियां ढूंढी जा रही है और उनके ऊपर ग्रंथ लिखने की कवायद की जा रही है। ना जाने वर्तमान के मानव को क्यों जीते जी मुर्दा बनाने की होड़ फैशन की तरह बढ़ती जा रही है और उनको उन दिशाओं में आगे बढ़ाने की प्रतियोगिता कराई जा रहीं हैं जिसके अंतिम छोर पर केवल चंद लोगों के लोभी हितों के विशालकाय जंगल है।

हे सांवरे! आप वर्तमान के इस चौसर ओर शकुनि के पाशों को देखकर समझ गए होंगे कि अब हर क्षेत्र में दुर्योधन व दुशासन से भी ज्यादा छली बलवानों का और शकुनियों के मैले लग गए हैं और क्षेत्र के चौराहे पर लज्जा का चीर हरण बिना रोक टोक हो रहा है जहां चिल्लाने से पहले ही लज्जा का गला घोंटा जा रहा है।

यह सब देख कर क्या तुम फिर आओगे सांवरे और द्रौपदी के चीर को बढाओगे। दुनिया में लज्जा को बचाने के लिए सुदर्शन चक्र धारण करोगे। आस्था वाला इसी आस से बैठा है और नास्तिक खुशियां बनाकर कहता है कि वो सब किताबों तक ही ठीक है।

सौजन्य : भंवरलाल