कार्तिक अमावस्या की मोह रात्रि में दीपावली

सबगुरु न्यूज। कार्तिक कृष्णा अमावस्या को आकाशीय सूर्य अपनी धुरी पर भ्रमण करते हुए अपनी निम्नतम अर्थात अपने गुणों से विपरीत आकाशीय तारामंडल की राशि तुला में होते हैं और चन्द्रमा भी उस दिन तुला राशि में सूर्य के नजदीक भ्रमण करता हुआ अस्त होकर पृथ्वी से दिखाई नहीं देता है।

ऐसी स्थिति में पृथ्वी पर काली अंधेरी रात हो ज़ाती है और प्रदोष काल से ही अंधेरा होंने लग जाता है। हर अमावस्या की रात में सूर्य व चंद्र एक साथ तुला राशि में नहीं होते और ना ही सूर्य का दक्षिणायन होता। जो अमावस्या दक्षिणायन में आतीं वहां सूर्य व चंद्रमा तुला राशि में नहीं होते।

इन्हीं को आधार मानकर धार्मिक मान्यताओं में अंधेरी रात के प्रदोष काल में अंधेरा होते ही सर्वत्र दीपक जलाकर प्रकृति से तालमेल बैठा कर व्यक्ति इस ब्रह्मांडीय ऊर्जा को अपने अनुसार प्राप्त कर सकता है। इस तरह की धार्मिक व तंत्र प्रणालियां हमारे ऋषि मुनियों ओर पूर्वाचार्यो ने विकसित की जो ज्ञान की अनुपम खोज थी।

मार्कण्डेय पुराण में तीन रात्रियों को विशेष रूप से माना गया है। काल रात्रि, महारात्रि और मोह रात्रि। होली की रात को काल रात्रि, शिव रात्रि की रात को महारात्रि तथा दीपावली की रात को मोह रात्रि के रूप मे माना गया है और इन महारात्रियों में रात के समय पूजा पाठ व उपासना का महत्व होता है।

दीपावली की रात को चार प्रहरों में भागों में विभाजित कर पूजा उपासना की जाती है। मोह रात्रि, दारुण रात्रि, काल रात्रि तथा महारात्रि। प्रथम प्रहर में मोह रात्रि में लक्ष्मी जी की पूजा व मंत्र व दूसरे प्रहर में दारुण रात्रि के दौरान भैरवी चक्र साधना व तीसरे प्रहर में काल रात्रि के समय महाकाली व शाबर मंत्र तथा चौथे चरण में चोसठ योगनी व त्रिपुरा सुदंरी के मंत्रों को सिद्ध किया जाता है। ऐसी तंत्र शास्त्र की मान्यता है कि दीपावली की रात को अमावस्या होती है अतः तंत्र उपासना में सफलता मिलती है।

प्राचीन धार्मिक ग्रंथो व तंत्र ग्रंथों के अनुसार प्राचीन काल में तंत्रों की दुनिया के विज्ञान की सभ्यता और संस्कृति इतनी विकसित थी कि पलक झपकते ही तंत्रों का जानकार अपने स्थान पर बैठे बैठे कई कार्य करवा लेता था।

तंत्रों की दुनिया के विज्ञान की ये सभ्यता और संस्कृति काल के गाल में समा समा गई तथा अपने कुछ अवशेषों के माध्यम से अपने यौवन का प्रमाण देती है। विशेष रूप से अथर्ववेद और अग्नि पुराण में विस्तृत व्याख्या दी हुई है, वे संकेत देती है कि गोपनीयं परम गोपनीयम। इन विद्याओं को बिना गुरु के निषेध बताई गई है।

जिन तंत्रों को भगवान शिव ने लिखा और भगवान विष्णु ने अनुमोदन किया वह शास्त्र “आगम शास्त्र “के नाम से जाना जाता है। आदि शंकराचार्य ने अपने ग्रंथ “सौंदर्य लहरी” में तंत्रों को यंत्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया और कनक धारा स्त्रोत से सोने की वर्षा करवा दी। गुरू गोरखनाथ ने असम में तंत्रों की सबसे शक्तिशाली पीठ कामाक्षा देवी की स्थापना कर तंत्रों का विस्तार किया।

सिद्ध पुरूषों ने डाबर और शाबर कई तरह के मंत्रों को सिद्ध कर दुनिया के लिए कल्याणकारी काम किए जाने के उल्लेख मिलते हैं। वर्तमान में जो ग्रंथ है शेष बचे हैं वे भी जन सामान्य के लिए एक रहस्य ही है।

समाज में इन्हीं धार्मिक मान्यताओं ने सामाजिक व्यवस्था में अमावस्या के अस्त चन्द्रमा को अपने मृतक पूर्वजों की यादों के रूप में माना जाता है और उनके निमित्त पूजा, ऊपासना, तर्पण, दान, पुण्य किए जाते हैं।

ज्योतिष शास्त्र का यह अस्त चन्द्रमा सभी शुभ और मांगलिक कार्यों को प्रतिबंधित कर देता है लेकिन कार्तिक कृष्णा अमावस्या को शुक ग्रह की राशि तुला में अपनी विशेषताओं को कमजोर करते सूर्य और चन्द्र के सामने शुक्र ग्रह की तुला राशि ही अपने गुणों को उजागर करती है और जो धन संपत्ति समृद्धि ओर लक्ष्मी की कारक होती है। उसी की मान्यताओं में लक्ष्मी पूजन और श्रेष्ठ खरीद का मुहूर्त मान कर करोडों रुपए का व्यापार होता है।

संत जन कहते है कि हे मानव, सूर्य आत्मा का कारक और चन्द्र मन का कारक होता है। दोनों ही माया के अधिपति शुक्र के घर में मिल जाते हैं। आत्मा और मन को शुक्र मोह लेता है और आत्मा अभौतिक ओर मन भौतिक लक्ष्मी को प्राप्त कर लेता है और वही रूप दीपावली बनकर खुशी के दीपदान करती हुई भाईचारा बढा देती है।

इसलिए हे मानव, शरीर मे बैठी आत्मा के प्रकाश से मन के अंधेरों को दूर कर और दीपक की लौ में पंतगे रूपी अहंकार को मिटाकर सकारात्मक के दीप जला।

सौजन्य : ज्योतिषाचार्य भंवरलाल, जोगणियाधाम पुष्कर