वो ग्रह सदा ही आंसू बहाता रहा

सबगुरु न्यूज। सदियों से आज तक रण का मैदान बना यह पृथ्वी ग्रह जिस पर हम निवास कर रहे हैं अब वह अत्यधिक पीडित होता जा रहा है। प्रेम की पंगडंडियों ने नफ़रत के चौडे रास्ते बना लिए हैं और मानव मूल्यों की परिभाषा बदल गई है। अपने अस्तित्व व वर्चस्व को बनाए रखने के लिए मानव हीन भावना से ग्रसित होकर बोली और भाषा ही नहीं बल्कि सभी तरह के अस्त्र शस्त्र काम में ले रहा है।

भारी मात्रा में गोला बारूद दाग कर मानव नहीं पृथ्वी धन को नष्ट कर रहा है और पीडा को सहति पृथ्वी को प्राकृतिक प्रकोपों से जूझना पड़ रहा है। यज्ञों की संस्कृति बदल कर अब भाषा की बमबारी कर रहीं है और आहुति बनकर मानव अपनी खुशियों को भस्म कर रहा है।

आदि मानव से लेकर विज्ञान के मानव तक, पौराणिक काल से वर्तमान काल, अवतारों से लेकर सामान्य मानव, पंगडंडियों से लेकर चौडे रास्तों, धर्म कर्म विश्वास से लेकर नास्तिकता, प्रेम की झोपड़ी से नफ़रत की दुनिया तक यहां तक कि अपनों से लेकर परायों तक वह सदा ही अपनी पीड़ा पर आसू बहाता रहा।

हर बार, हर दिन, प्रति क्षण वह ब्रह्मांड के महातारे सूर्य के चारों ओर चक्कर लगा लगाकर अपनी पीड़ा पर मरहम लगाने की कवायद करता रहा, करता जा रहा है पर उस ग्रह की कोई सुनने वाला ना था और ना ही अपनी दुनियादारी में किसी को इतनी फुर्सत थी। यदा कदा अपनी दुनिया को ही सुन्दर बनाने के लिए उसकी ओर दया भावना से देखा।

अपनी आखों में आंसू लेकर जब वह सृष्टि के रचयिता के पास जाती तो वहां उसकी पीड़ा के निवारण हेतु उसके पास दिव्य व अवतारी आत्मा को प्रकट कर उसे राहत दी जातीं थी और तमाम उन बुरी शक्तियों को मौत के घाट उतार कर उसे पुनः स्वस्थ कर दिया जाता था। ऐसा विश्व सभ्यता और संस्कृति के आदि इतिहासों में बताया गया है।

विश्व के तमाम अवतारों महापुरूषों, महाविचारक, दार्शनिक और कल्याणकारी व्यक्तियों के महान कार्य भी इसे पूर्ण रूप से आज तक स्थायी आराम नहीं पहुंचा सके और वह आज तक अपनी पीड़ा पर आंसू बहा रही है, सभी को सब कुछ देने के बाद भी।

संत जन कहते हैं कि हे मानव आकाशीय ग्रह में हम सब पृथ्वी ग्रह पर निवास करते हैं और अपने हर अरमानों की उपलब्धि के लिए किताबों से लेकर परमाणु बम तक इस पृथ्वी पर लिए घूमते हैं। सर्वत्र अपने अस्तित्व को जमाए रखने के लिए हर स्तर पर उतर जाते हैं। चाहे वह कोई भी क्यो ना हो।

अपना वर्चस्व स्थापित कर अपना अधिकार तो जमा लेते हैं पर इसके प्रति अपने दायित्वों व कर्तव्यों को नहीं निभाते, बस यही जानकर ये ग्रह हमारा क्या बिगाड़ लेंगे बल्कि हम इसे खोद खोदकर इसमें से सब कुछ निकाल कर इसकी स्थित दयनीय कर देंगे ओर लाखों टन गोला बारूद डाल कर हम दुशमन, सभ्यता और संस्कृति को मिटा देंगे। जबकि मानव भूल जाता है कि मैं भी इस ग्रह का निवासी हूं।

इसलिए हे मानव यह आकाशीय ग्रह पृथ्वी किसी सांप के फन पर नहीं बल्कि ग्रहों के आकर्षण बल पर टिकी हुई है। शनै शनै इसकी शक्ति का ह्रास होता जा रहा है और आकाश के दूसरे ग्रहों के प्रभावों को झेलने की इसकी क्षमता कम हो रहीं है। विकट आंधी तूफानों और प्राकृतिक प्रकोप की विश्व स्तर पर संख्या बढ़ती जा रही है जिसे हम बस ग्लोबल वार्मिंग कहकर कुछ उपाय व सुधारों के सम्मेलन कर दस्तावेज बना कर ही रह जाते हैं।

इसलिए हे मानव अब आवश्यकता है कि अस्तित्व पृथ्वी का बचाए रख और दूसरे ग्रहों के प्रभावों के दोष दूर करने की बजाय पृथ्वी ग्रह पर छाए दोष के महाउपाय कर, तुझे परमात्मा ही शांति का महा पुरस्कार प्रदान कर देगा।

सौजन्य : भंवरलाल