मुख में चाबे नागर पान, म्हारा वीर हनुमान

सबगुरु न्यूज। अंहकार जब शंखनाद कर जब अपने चरम पर पहुंच जाता है तब प्रचंड मारूतों के पिता रूद्र, लालनेत्र ओर गोरा बदन जिनका स्वरूप है जो एक पल में सब कुछ विध्वंस करने की क्षमता रखते हैं जो सबको रूला सकने के कारण रूद्र कहलाते हैं।

ऐसे रूद्र से ऋग्वेद का ऋषि प्रार्थना करता है कि हे रूद्र हम जानते हैं कि तुम हम सब को रूला सकते हो, हमारा सब कुछ खत्म कर सकते हैं इसलिए हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि तुम हमारे जन्म मृत्यु के बन्धन को खत्म कर मोक्ष रूपी अमृत को प्रदान करों।

इस प्रार्थना से रूलाने वाले रूद्र फिर कल्याण कारी बन जगत में “शिव” कहलाते है। यहीं शिव जगत के कल्याण के लिए अपने दस रूप धारण करते हैं लेकिन अंहकारी शक्तियों को मिटाने के लिये फिर ग्यारवे रूद्र के रुप मे बंजरग बनकर प्रकट होते हैं और अंहकारी शंख नाद करने वाले को मिट्टी मे मिला देते हैं।

संसार मे अंहकारी शक्तियों को मिटाने की चुनौती का संकल्प ले उसे पान के बीडे की तरह मुंह में चबाने लग जाते हैं और बल बुद्धि से अंहकारी का विनाश कर सबको सुखी और समृद्ध बना देते हैं वीर हनुमान।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को जब रावण जैसी अंहकारी शक्तियों ने घेर लिया तब श्रीराम ने रामेश्वरम में पंचड सागर को पार करने के लिए शिव लिंग की स्थापना की तथा शिव की पूजा उपासना की। साक्षात रूप में शिव एकादश रूद्र बजरंग के रूप में मारूति बन कर राम जी की सेवा की।

शिव ने, रामेश्वरम में राम से सेवा ली तथा मारूति बन कर राम की सेवा की। भगवान भोलेनाथ ने हवा के वेग से भी ज्यादा तेज गति से उडने वाले मारूति अर्थात बंजरग बन कर लंका विजय को आसान कर दिय़ा।

आज भी मान्यता ओर विश्वास है कि हनुमान जी हर व्यक्ति के संकट को काटने के लियें बीड़ा ऊठा कर संकट को खत्म करते हैं इसलिए आम आदमी पान का बीड़ा हनुमान जी के अर्पण कर अपना दुःख दर्द पेश करते हैं और हनुमान जी सबका बेड़ा पार कर देते हैं।

संत जन कहतें है कि हे मानव जिसमे कल्याण करने की भावना है और जो अपने अंहकार को मिट्टी में दबा देता है तब ही यह वीर हनुमान प्रकट होकर हर संकट को आसान कर देते हैं और उन्हे ही आस्था का फल मिल सकता है।

इसलिए हे मानव तू केवल राम वाले हनुमान जी की ही पूजा कर जो राम जी के हर संकट को दूर करने की क्षमता रखते हैं। वरना कई व्यक्ति संकट मोचक बने केवल अपनें स्वार्थो की पूर्ति करने के लिए ही घूमते रहते हैं।

सौजन्य : भंवरलाल