विष के सागर में अमृत धारा

सबगुरु न्यूज। विष का सागर कितना भी बडा क्यों न हो उसमें भी अमृत धारा अपना अस्तित्व बनाये रखते हैं। कोटि बरस जल मे रहने के बाद भी चकमक पत्थर की आग बरकरार रहती है क्योंकि इनकी संरचना ओर प्रबन्धन में दोहरा शासन नहीं होता है अर्थात अमृत धारा व चकमक पत्थर शासक के पास रहे या प्रबन्धक के पास, वे सर्वत्र अपने गुणों से एक ही परिणाम देते हैं।

स्वर्ग के शासन पर जब दैत्य राज हिरण्यकषिपु ने कब्जा कर लिया था और सर्वत्र दैत्यों की सत्ता स्थापित हो गई थी। स्वर्ग की संरचना के अनुसार उसके हर सुख सुविधा का उसने जमकर इस्तेमाल किया लेकिन वहां प्रबन्धन के सिद्धांत को बदल डाला, सिर्फ इसलिए की वे एक महत्वाकांक्षी और बलवान शासक था यही व्यवस्था शनै शनै उसके पतन का कारण बनती रहीं।

उसने परमात्मा की परिभाषा का इतिहास बदल डाला और स्वयं को ही परमात्मा घोषित कर दिया तथा विरोध करने वालों को मौत के घाट उतार दिया। अपने पुत्र भक्त प्रह्लाद को भी उसने इस कारण खूब यातनाएं दीं। इतना ही नहीं उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि तुम अपने अग्नि स्नान करते समय प्रह्लाद को भी अपनी गोद में लेकर बैठो ताकि ये जल जाए ओर मेरे विचारों का विरोध करने वालों को अस्तित्व भी खत्म हो।

वह आम जन और साधु संन्यासियों पर हर तरह से जुल्म ढाता रहा फिर भी स्वर्ग की हर सुविधाओं का बडी बेरहमी के साथ दुरूपयोग करने लग गया। अपने शासन मे उसने हर अपने सेनापति को कमजोर बना दिया और अपने खास विश्वास पात्रों का दल अलग बना लिया।

इस दोहरे कुशासन में सब अपनी-अपनी मनमानी करते रहे, सर्वत्र अदने से शासक व व्यवस्थापक भी अहंकार की आग में आम जन की आहूति देने लगे। वह स्वयं हिरण्यकषिपु अपने अबोध बालक को मारने के लिए ऊतारू हो गया, होलिका तो जल गई पर प्रह्लाद बच गया। फिर भी वह ना माना और उस बालक का वध करने के लिए स्वयं कूद पडा तथा परमात्मा के हाथों मारा गया।

इस पूरे ही खेल में वह अबोध बालक तो बच गया लेकिन स्वर्ग पर साम्राज्य स्थापित करने वाला शक्ति शाली योद्धा मारा गया। उसके दोहरे प्रबन्धन के जाल में वह खुद ही फंस गया। एक ओर तो स्वर्ग की सुविधाओं का भोग करने लगा ओर दूसरे स्वर्ग के गुण धर्म के अनुसार शासन नहीं किया, अपने सिद्धांतों पर राज्य को चलाने का कार्य कर स्वयं ही आत्म घाती बन बैठा।

संत जन कहतें है कि हे मानव स्वर्ग के अमृत समान सागर को उसके सिद्धांतों, नीतियों व व्यवहार ने विष का सागर बना डाला और हिरण्यकषिपु एक अमृत धारा समान अबोध बालक के कारण मारा गया।

इसलिए हे मानव अपने सिद्धांत व व्यवहार में दोहरापन नहीँ रखने वाला प्रबन्धन ही व्यवस्था को सही अंजाम दे सकता है अन्यथा वह अपने कुप्रबन्धन का स्वयं ही शिकार बन जाता है।

सौजन्य : भंवरलाल