‘मैं’ सब कुछ बदल सकतीं हूं

सबगुरु न्यूज। मैं ना तो भूत प्रेत हूं और ना ही भगवान। ना ही टोना टोटका और ना ही कर्मकांड। स्त्री, पुरुष, बालक, वृद्ध आदि से मैं कोई परहेज नहीं रखती। यह सब मेरे अपने हैं और ये मेरे खेल की कठपुतलियां हैं। अमीरी और गरीबी से मेरा कोई सरोकार नहीं। मैं राजा को भीख मंगवा देती हूं तो भिखारी को राजा बना देती हूं।

धर्म स्थल हो या श्मशान। शहर हो या गांव। गली मोहल्ले हो या घर। अपने पराये हों या पडोसी। जंगल हो या मैदान। जमीन, आकाश, हवा, पानी, आग हो या खाने पीने की सामग्री। सूरज, चांद, तारे हों या दुनिया में स्वर्ग जैसे भवन। ये सब मेरे ही अधीन होते हैं और इन सब को आबाद और बरबाद मैं ही बनाती हूं।

दुनिया में शान शौकत तथा ऐश आराम को मैं ही बढ़ाती हूं तो मैं ही इन सबका नाश भी करा देती हूं। मैं हर काल में अमर रहतीं हूं। मैं वर्तमान में रहकर भूत को उखाडती हूं और भविष्य के डर और सपने दिखाती हूं। हर काल मेरे अधीन रहा है। स्वर्ण काल हो या फिर बर्बादियों का काल यह सब कुछ करना भी मेरे मिज़ाज में है।

बदमाश को शरीफ़ और शरीफ को मैं ही बदमाश बना देती हूं। सच्चे को मैं कारागृह में डलवा देती हूं तो झूठ से राज करवा देती हूं। अपना बल के बूते मैं सबको झुका देती हूं और जरूरत पड़ने पर मैं इन सब के पांव पड जातीं हूं।

मेरा अपना कोई चरित्र नहीं है। पवित्र बनकर मैं पूर्णिमा बन जातीं हूं तो मैं ही ग्रहण लगाकर अशुद्ध हो जाती हूं। मैं अपनी इच्छा से भारी विवादों को खत्म कर देतीं हूं, तू गलत नीयत रख कोई भी विवाद हल नहीं हूं।

प्रेम, घृणा और नफ़रत बैर बदला यह सब मेरे भीतर रहती है और जरूरत के अनुसार मैं अपना रूप बदल लेती हूं। मकसद पूरा होने पर में गधे के पांव भी पड जातीं हूं और मकसद पूरा न होने पर मैं शेर के अस्तित्व को भी समाप्त कर देती हूं। मैं कौन सी करवट बदलूंगी और किसे क्या दूंगी यह अब तक कोई जान नहीं पाया। अनाडियो की भोग वस्तु बन उन्हें आनंद करा दिया तो उन शक्ति के सूरमाओं को भी मेरे खेल में मात खिला दी।

सदियों से आज तक मेरी कहानी यही है। मैं कभी घुटन में नहीं रही और ना रहूंगी। भले ही मैं शत्रुओं व विरोधियों की अधीनता स्वीकार कर लूं लेकिन अपनों के लात मार दूंगी। स्वर्ग के राज़ सिंहासन पर मेरी ही बुद्धि को देख। मैने देवों के राज छीनवा दिए और दैत्यो को राज दे दिया। मैने ही मान बढाया तो मैने ही सबके मान को घटवा दिया।

मैने कहा न कि मेरा रूप, रंग, चाल, चरित्र सदा ही बदलता रहा है और आयु, भाषा, लिंग, रंग भेद आदि से मेरा कोई परहेज नहीं रहा है। खिलाड़ी हो या अनाड़ी इन सबको मैं एक ही मानतीं हूं।

सामाजिक आर्थिक धार्मिक वैचारिक आदि सभी क्षेत्रों में मैं ही राज करती हूं। जिस भी नीति को मैंने जैसा चाहा उसे अपना लिया। भले ही मुझे किसी भी हद तक नीचे या ऊंचे जाना पडे या सबको भले ही आबाद और बरबाद करना पडे।

मैं भूतों को भगवान और आस्था विश्वास को अंधविश्वास बना देती हूं। जरूरत पडी तो इनके पांव भी पड जाती हूं और इन्हें जड से खारिज करा देती हूं। मेरा कोई धर्म नहीं है लेकिन हर नीति धर्म में मैं अपनी भूमिका को अपने ही न्याय सिद्धांत के अनुसार मानतीं हूं। आप भली भांति समझ गए होंगे कि घर से लेकर पूरी दुनिया में राज करतीं हूं। मेरा नाम है राजनीति है।

संत जन कहते हैं कि हे मानव, जहां “मैं” का खेल शुरू होता हैं बस वही से इस नीति का जन्म शुरू हो जाता है, चाहे सकारात्मक रूप से या फिर नकारात्मक रूप से। सकारात्मक बन कर यह निर्माण करती है और यदि यह नकारात्मक बन जाती है तो फिर बिना आंधी तूफ़ान बरसात के भी भारी मात्रा में बर्फबारी कर जन जीवन अस्त व्यस्त कर देती हैं। “मैं” मानव की जन्म जात मनोवृत्ति होती है और इसे रोकी नही जा सकती है।

इसलिए हे मानव जमीनी स्तर पर इस ‘मै’ को ‘हम’ की भावना में बदल कर सकारात्मक राजनीति को ही अपना कर सभी सुखी और समृद्ध रखा जा सकता है। इसलिए पहले स्तर पर ही हम की भावना का बीजारोपण किया जाना चाहिए। बाक़ी सब इससे परिचित है।

सौजन्य : ज्योतिषाचार्य भंवरलाल, जोगणियाधाम पुष्कर