मन की वास्तु जहां देव कृपा बरसती है

सबगुरु न्यूज। प्राचीनकाल से मान्यता चली आ रही है कि निवास, व्यवसाय व पूजा करने के लिए जिन भवनों, ईमारतों, किलों, मंदिरों का निर्माण किया जाता है है वे सब वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए। इन सिद्धांतों मे पंच महाभूतों का अनुकूल संतुलन होता था तथा दिशाओं के गुण धर्मो के अनुसार ही कार्य होता था।

इन सिद्धांतों पर अपार गांव नगर राज्य किले मंदिर बने जो शनै शनै काल के गाल में समा गए। कुछ आवासों में कई व्यक्ति और परिवार अपना नाम अमर कर गए तो कुछ समय से पूर्व ही इस दुनिया से चले गए। यह भी सत्य है कि हम सब विदेशी आक्रमणों से जूझते रहे और लुटते रहे। विदेशी हम पर राज करते रहे। इतना ही नहीं तंत्र, मंत्र, यंत्र, टोने टोटके और तमाम विद्या, साधक, योगी, देवों की छाया भाव यह सभी यहा होते हुए भी काल के प्रहार से बच नहीं पाए।

विश्व के प्राणियों का कल्याण करने वाला उन्हें अपनी कृपा का प्रसाद बांटकर हर समस्या का समाधान करने वाला “देव” कहलाता है। यह ‘देव’ या “देवता” अभौतिक शक्तियों का पुञ्ज होता है। जिस भूमि पर सात्विक तत्व में वृद्धि होती है उसी भूमि पर इस शक्ति पुंज का स्वतः ही उदय हो जाता है। अन्य शब्दों में हम कह सकते है कि जिस भूमि पर सात्विक तत्व बढ़ जाता है, वहां देव कृपा की सदा अमृत रूपी वर्षा होती है।

विश्व में अनेक स्थल है जहां का सात्विक तत्व बढ़ा हुआ है और अपार मात्रा में श्रद्धालु जन वहां जाकर आनंद की अनुभूति करते हैं। इन स्थलों में अनेक वन, उपवन व धार्मिक स्थल आदि होते हैं जहां थोड़े दिन रहने के बावजूद भी अत्यंत आनंद की अनुभूति होती है।

इसके अतिरिक्त कुछ भूमि गली मोहल्ले नगर शहर और देश में भी होती है जहां का सात्विक तत्व बढ़ा हुआ होता है ऐसी भूमि पर आवास बनाकर निवास किया जाता है तो वहां देवी की जमकर कृपा बरसती है। ऐसी भूमि पर आवाज बना कर रखने वाला सुखी समृद्ध तो रहता ही है, साथ ही वहां जो भी प्राणी अपनी समस्या को लेकर आता है उसकी भी समस्या का निदान हो जाता है।

ऐसा सात्विक भूमि पर निवास करने वाले प्राणी का स्वयं का भी सात्विक तत्व बढ़ जाता है और अपने अंतिम समय तक वह सात्विक कार्य को करता हुआ देवलोक में पहुंचाता है।

अब सवाल यह उठता है कि कौन सी भूमि सात्विक है उसकी पहचान कैसे होगी। इन सवालों के जवाब आसान नहीं है। मात्र हम उस भूमि की मिट्टी का रंग सफेद मानकर ही उसे सात्विक भूमिका कह देंगे। वास्तु शास्त्र के तमाम सिद्धांतों से भूमि चयन के संबंध में यदि इन आधारों पर भी भूमि का चुनाव कर लें तो भी यह आवश्यक नहीं कि वह भूमि सात्विक गुणों से परिपूर्ण हो।

वास्तव में यह सवाल और भौतिक जगत में संबंध रखने वाला होता है, अतः इतना आसान नहीं है कि हम वास्तु शास्त्र के भौतिक सिद्धांतों के आधार पर इनका जवाब दे सके। यूं तो इस संबंध में हजारों तर्क दिए जा सकते हैं लेकिन वह बेबुनियाद ओर आधार हीन ही होंगे।

जिस भूमि पर संत महात्मा, योगी जन निवास करते हो, धार्मिक स्थल बने रहते हों वहां भी यह आवश्यक नहीं है कि वह भूमि सात्विक हो, क्योंकि यह स्थल भी कई बार बड़े विवाद में फंस जाते हैं जहां महात्मा योगी जनों और धार्मिक स्थलों की बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ता है। कई बार ऐसा भी देखा जाता है जहां राजसी प्रवृति के व्यक्ति या तामसी प्रकृति के व्यक्ति रहते हैं। वहां भी सात्विक तत्व बढ़ जाता है तथा उन राजसी और तामसी परिवारों में भी सतोगुणी व्यक्ति जन्म लेकर वहां सात्विक सत्ता का साम्राज्य स्थापित कर देते हैं।

इतिहास के गवाह है कि राजा भर्तृहरि में राजसी ठाट-बाट छोड़ वैराग्य को धारण कर लिया। लंका में जन्मे विभीषण सतोगुण का साम्राज्य स्थापित किया। भक्त प्रहलाद और राजा बलि ने तामसी घरानों में जन्म लेने के बावजूद भी सतोगुणी बन सात्विक साम्राज्य की स्थापना की। अतः नतीजा यह निकलता है कि भूमि की मिट्टी का रंग इसका कोई आधार नहीं है और ना कि कोई कुल और घराना ।

भूमि का छोटा सा टुकडा सात्विक पूर्ण भारी पड़ सकता है और रजो गुण और तमोगुण की सत्ता का नाश कर सकता है। वही राजसी अपना अपना प्रभाव दिखा सकते हैं। अतः यह आध्यात्मिक तथ्य है कि भूमि किन गुणों की प्रधानता को रखती है।

व्यवहार में कई वास्तु ऐसे देखी जाती है जहां ऐसा लगता है कि वास्तव में यह आध्यात्मिक देवों की कृपा अमृत बरसाती है। इन वस्तुओं में रहने वाले सदा सुखी समृद्ध भाग्यशाली होते हैं तथा इसका असर इतिहास जो जो भी व्यक्ति आता है वह सभी सुखी समृद्ध और भाग्यशाली बन जाते हैं।

व्यवहार में इन वस्तुओं में देखा गया है कि भले कि यहां वास्तुशास्त्र के नियमों के विपरीत सिद्धांत हैं फिर भी वह वास्तु प्रसिद्ध और उसके रहने वाले जन कल्याण करते हैं। अपवाद संतों के पुराने आश्रम, आवास, निवास इस बात के पुख्ता उदाहरण है।

भूत, प्रेत, टोना, टोटका, जादू को भले ही विज्ञान अंध विश्वास मानें लेकिन व्यवहार में जब कोई व्यक्ति पीड़ित होता है तो विज्ञान के पास उनका हल नहीं होता है। ऐसी स्थिति में जब आध्यात्मिक विज्ञान जब उस पीड़ित व्यक्ति को ठीक कर देता है तो स्वतः ही आध्यात्मिक विज्ञान का अस्तित्व समझ में आ जाता है। इस कारण विश्व में लाखों व्यक्ति आध्यात्मिक विज्ञान के अनुयाई बने हुए हैं।

आध्यात्मिक विज्ञान के इस सफ़र में मैंने कई ऐसे आवास देखे हैं जो वस्तु सिद्धांतों के विपरीत बने हुए हैं फिर भी उसके रहने वाले सुखी समृद्ध है। कई ऐसे आवासों में संत प्रवृत्ति के लोगों को देखा जिनके दर्शन और आशीर्वाद मात्र से कि कई मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। वास्तव में ऐसा लगता है कि यहां आध्यात्मिक शक्ति का पुंज है और आध्यात्मिक देवों की जमकर कृपा बरसती है।

संत जन कहते हैं कि हे मानव! प्रकृति ने जगत और इसमे रहने वाले जीवों को उत्पन्न किया है। अत: मानव द्वारा बनाया सिद्धांत प्रकृति से बडा नहीं होता। प्रकृति के सिद्धांतों का लुत्फ़ लेने के लिए प्रकृति के सिद्धांतों की तरह व्यवहार कर। मन में कल्याण के भाव रख तू स्वयं देव होकर सिद्ध हो जाएगा और हर भूत, प्रेत, जींद, पिशाच और बेताल तेरे कदमों में होगे। तेरे मन के विचार मैले नहीं होंगे और दोषों स तू सदा मुक्त रहेगा।

सौजन्य : भंवरलाल