उजालों से अंधेरे मिटते गए, मिटते गए…

सबगुरु न्यूज। ऊजाले जब फैलने लगते हैं तो वह अंधकार की हर हकीकत को उजागर कर देते हैं पता चल जाता है कि अंधेरों ने क्या सकारात्मक या नकारात्मक रचना की है। रचनाएं चाहे संगठित हो या असंगठित, उजाले उसकी हकीकत से रूबरू करवा देते हैं। यही हकीकत ज्ञान के मार्ग पर बढाकर चलना सीखा देती है और जीवन के हर क्षेत्रों में ज्ञान का प्रकाश डाल कर जीवन को सुखी और समृद्ध बना देती है।

जन्म एक अंधेरा होता है और ज्यो ज्यो वह जीवन के मार्ग पर बढ़ता है त्यो त्यो उसे बालपन, जवानी और बुढापे का ज्ञान होने लग जाता है। वह समझ जाता है कि मैं सत्य नहीं हूं और मेरा रूप मृत्यु में बदल जाएगा। जन्म जीवन भर भौतिकता में महानता को ढूंढता है और वह भौतिक उन्नति कर आने वाली पीढ़ियों को सांसारिक मोहमाया में डाल देता है।

जीवन के सामने खड़ी मृत्यु उसे ऊजाले की ओर लाने में लगी रहती है और उस जीवन को ज्ञान देती है कि तू जीवन की यात्रा का मुसाफिर है और ये जगत एक सराय की तरह, यै तेरा ठहरने का अस्थायी निवास है अतः इस सराय को बनाने की संस्कृति के अलावा इसमे ज्ञान का प्रकाश भी कर ताकि जन्म को जीवन के सफ़र में अंधकार का सामना ना करना पडे।

ऋतुओं के माध्यम से कुदरत यह बताने का प्रयास करती है कि बंसत ऋतु मदमस्त नायिका बन अपने सफर के साथी के प्रेम जाल में फंस जाती हैं और उसे पाने के लिए वह गर्मी में तपकर अपने प्रियतम सूर्य से मिलन करती है। उन दोनों का मिलन बरसात करता हुआ सृष्टि सृजन की ओर बढता है। शरद ऋतु की खीर पाकर वह शरीर को पुष्ट बनाती है। फसल रूपी फल, फूल व अन्न को पाकर वह हेमन्त ऋतु भौतिक सुखों के दीपक जलाती है।

अपनी पहली फुर्सत में याद आते हैं, उसे अपने पराये जिन्हें वह पीछे छोड़ कर आ चुकी है। शरद ऋतु में वह कांपती हुई उन आचार, विचार, व्यवहार, रीति, रिवाज, श्रद्धा, आस्था को याद करने लगती है और ज्ञान के प्रकाश फैलाकर यह संदेश देती है कि अब इस सफर में मैं थक चुकी हूं। मेरा शरीर कईं व्याधियों से घिर चुका है तथा शिशिर काल मुझे जर्जरित कर देगा और पतझड ऋतु भी पुराने वस्त्र छोड़ कर नए वस्त्र धारण कर लेगी और मेरा अंत हो जाएगा। मैं भी पुनर्जनम की ओर बढ जाऊंगी।

धार्मिक कथाओं में इन्ही सिद्धांतों के आधार मान्यताएं, विश्वास, आस्था पैदा की गई और मार्गशीष मास के महत्व को उजागर करती है। मार्गशीर्ष मास मोक्षदायक व कल्याणप्रद माना गया है। शिवपुराण की शतरूद्र संहिता की मान्यता के अनुसार इस मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भगवान शिव ने भैरव रूप में अवतार लिया था। इसलिए यह काल भैरव अष्टमी कहलाती हैं। इसी मास की शुक्ल पंचमी को श्रीराम का विवाह हुआ था इस कारण अवध और जनकपुरी मे बड़े धूम धाम के साथ यह उत्सव मनाया जाता है।

मानव कल्याण के लिए श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन को उसके मन में उपजे हर एक संशय को दूर कर उसके ह्रदय में ज्ञान की ज्योत जला दी और कर्म का उपदेश दिया। श्रीकृष्ण और अर्जुन के इन संवादों को गीता उपदेश के नाम से जाना जाता है। जिस दिन इस ज्ञान की शुरूआत हुई वह इसी मास की शुक्ल एकादशी थी। मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को ही मोक्षदा एकादशी कहा जाता है।

धर्म शास्त्र के अनुसार इस एकादशी को पितर जिनका मोक्ष नहीं हुआ हैं उनके लिए व्रत दान पुण्य करने से उनका मोक्ष व कल्याण होता है। इस दिन भगवान दामोदर की पूजा उपासना की जाती है व पितरों के नाम से दान दिया जाता है।

मार्गशीष मास की शुक्ल एकादशी को श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन को गीता का ज्ञान देना शुरू किया।
इसी मास की पूर्णिमा के दिन भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ था। सती अनुसूया के गर्भ में ब्रह्मा, विष्णु और शिव के आशीर्वाद से भगवान दत्तात्रेय ने जन्म लिया था। मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को भगवान दत्तात्रेय की जयंती मनाई जाती है। अतः बारह मासो में इस मास को शीर्ष माना जाता है।

संत जन कहते हैं कि हे मानव अब सूर्य वृश्चिक राशि के तारामंडल की ओर बढता जा रहा है और उतरायन की ओर होने के लिए गतिशील हो रहा है। सूर्य की यह चाल ठंडी ऋतु का परचम लहराने लग गई है और मानव को कह रही है कि अब कार्तिक मास के धार्मिक महास्नानों से जलाशयों का जल हिल गया है। अब शरद ऋतु जनजीवन को ठंडा करने के लिए आ रही है जरा संभल कर रहना नहीं तो जीवन का सफर खतरे में पड सकता है।

इसलिए अब इस ज्ञान से तू अपने जीवन के सफर को ऋतु अनुकूल बना। ज्ञान के उजलों में अंधेरे को दूर कर और अंधेरे को दूर कर।

सौजन्य : ज्योतिषाचार्य भंवरलाल, जोगणियाधाम पुष्कर