दमदार बनने के खेल में निकल ना जाए दम

सबगुरु न्यूज। कुदरत की बनाईं रचना में प्राणी अपने जन्म के साथ ही दमदार बनने के खेल में लग जाता है और जीवन भर विभिन्न क्षेत्रों में अपने दम का प्रदर्शन कर दमदार बनने की कवायद में लगे रहता है।

इस दमदारी के खेल में प्राणी सबसे पहले अपनी इच्छाओ की पूर्ति के लिए रोता है चिल्लाता है और बिलखता है ओर किसी पर दया का मोहताज होकर बैठ जाता है। जैसे ही उसे पहली बार सहारा मिलता है और उसकी इच्छाओं की पूर्ति होना शुरू हो जाती है तो वह दमदार बनना शुरू हो जाता हैं। धीरे-धीरे यह दमदारी उसे शक्ति मान बनाने की तैयारी में जुट जाती है।

शक्तिमान बनने के खेल में व्यक्ति जब सफल नहीं हो पाता है तो वह अनीति का रूप धारण कर सबको हर प्रकार से डराने धमकाने में लग जाता है और अपने मूल दायित्वों से भटक कर घाती, पापी और विश्वासघाती व्यक्ति का एक समूह बनाकर अपने प्रहार शुरू कर देता है।

इस खेल में विश्वासघाती अपनी दोहरी नीति बना कर अनीति के बादशाह का साथ आंतरिक रूप से देता है और दूसरे व्यक्तियों का नुकसान कराने में प्रसन्न होता रहता है कि अब मैं पूर्ण रूप से सुरक्षित हूं क्योंकि मैंने दोनों का विश्वास जीत लिया है और ये दोनों लडकर खत्म हो जाएंगे और मैं ही इस खेल में जीत जाऊंगा।

शक्तिमान बनने की कोशिश करता हुआ अनीति का बादशाह और विश्वासघाती दोनों खुश होकर खेल का आनंद लेते रहते हैं। अपनी इन स्थितियों, परिस्थितियों और दोनों की झूठ से जूझता व्यक्ति जब परमात्मा को फरियाद करता है तो परमात्मा एक ऐसे माहौल का निर्माण कर देता है कि वह दोनों ही का वियोग करवा देता है। दोनों ही अपनी-अपनी परिस्थितियों में उलझ जाते हैं और दमदार बनने के खेल में दोनों ही दर दर की ठोकर खाते फिरते हैं और धीरे-धीरे दोनों का दम निकलने लग जाता है।

संतजन कहते हैं कि हे मानव, शक्तिमान दमदार बनने के लिए नीति और कार्य के प्रति अपनी स्वामीभक्ति व दायित्वों का निर्वहन ही मुख्य अस्त्र शस्त्र होते हैं ना कि दूसरों के कंधों पर चढ़ कर और उसे तोड़कर दमदार बना जाए या अपनी कार्य क्षमता की अकुशलता और असफलता के लिए दूसरों पर आरोप लगाए जाए। इसलिए हे मानव, तू नीति और नीयत दोनों को ही साफ रख नहीं तो दमदार बनने के खेल में तेरा दम निकल जाएगा।

सौजन्य : ज्योतिषाचार्य भंवरलाल, जोगणियाधाम पुष्कर