भावनाओं के फल परमात्मा के हाथ

सबगुरु न्यूज। इस दुनिया में यदि समझ पैदा नहीं होतीं तो कभी भी झूठ, कपट, मिथ्या पाखंड का शैतान नहीं होता और जब शैतान नहीं होता तो फिर भगवान भी नहीं होता। मानव केवल आदि मानव की तरह से ही अपने जीवन का गुजर बसर करता रहता।

समझ ने इच्छाओं को जन्म दिया और इन इच्छाओं को पूरा करने के लिए कोई तो शैतान का रूप धारण कर सबको अपने नियंत्रण में रखता रहा और कोई भगवान का रूप धारण कर सबका सहारा बनने लग गया। दोनों ही रूप अपने अपने कार्य में दक्ष हो गए और अपना साम्राज्य फैलाने लगे। साम्राज्य बढाने के लिए दोनों ही रूप आमने सामने हो गए। दोनों ही रूप के अनुयायी अपने अपने रूपो के स्वामियों को शक्तिमान बता एक दूसरे को कोसते रहे लडते झगडते रहे तथा अपने अस्तित्व को बचाने के लिए अपने अपने ही रूप गुणों के अनुसार काम करते रहे।

कई वर्षों पूर्व की एक लोक कथा है जब राजस्थान की मरूधरा के जैसलमेर के पोकरण में बाबा रामदेव जी चमत्कारी संत अवतरित हुए थे। उस समय एक व्यवसाय करने वाला एक व्यक्ति अपनी बैलगाड़ी में कुछ खाने पीने का सामान बेचने के लिए ले जा रहा था। बाबा रामदेव जी राजा के पुत्र थे उन्होंने उस व्यक्ति को पूछा कि हे भाई क्या सामान बेचने जा रहा है।

तब वह व्यक्ति बोला कि हुजूर में तो एक व्यापारी हूं और जहां जो माल बिकता है उसी तरह का ही माल बेच कर मुनाफा कमाता हूं। मैं इस बार नमक बेचने आया हूं और मेरे बैलगाड़ी में नमक है। बाबा रामदेव जी ने कहा तेरा वचन सत्य हो। जाओ और अपना काम करो। व्यापारी खुश हो कर चला गया कि मेरे पास तो मिश्री थी और मैंने नमक बता कर चुंगी बचा ली।

अगले गांव में जैसे ही वह मिश्री बेचने लगा तो खूब मिश्री बिकी लेकिन जैसे ही लोगों ने मिश्री का स्वाद चखा तो केवल नमक ही स्वाद आ रहा था। लोगों ने खूब खरी खोटी सुनाईं और कहा कि तू हमे मिश्री के बहाने ढगने आया है। तब वह व्यापारी बाबा रामदेव जी के पास गया और माफी मांगी। नमक फिर मिश्री बन गया।

संत जन कहते हैं कि हे मानव, भावनाओं का व्यापार कर जो व्यक्ति मुनाफा कमाने की कोशिश करता है तो हर बार उसे सफलता नहीं मिलतीं क्योंकि जो सच है वह सच ही रहेगा और सच को बार बार नहीं ठगा जा सकता। नमक का व्यापारी बाबा रामदेव जी को कहता है कि हे मेरी भावनाएं केवल ठगने की थी, मैंने आपको ठग लिया था लेकिन आप भी कम नहीं थे हुजूर जो मेरी भावनाओं के अनुसार ही आपने फल दिया।

इसलिए हे मानव तू शुद्ध भावनाओं से व्यवहार कर भले ही मुनाफा तेरे कर्म को ना मिले लेकिन कर्म को बदनाम मत कर और जो होगा वही परमात्मा की इच्छा होगी तेरी इच्छाओ के अनुसार तो कर्म फलीभूत नहीं होगा क्योंकि इस जगत को चलाने वाला हुजूर भी कम बलवान नहीं होता है।

सौजन्य : ज्योतिषाचार्य भंवरलाल, जोगणियाधाम पुष्कर