हंसा निकल गया काया से…

सबगुरु न्यूज। शरीर को काया कहा जाता है और उस शरीर को जिन्दा रखने वाली प्राण वायु रूपी ऊर्जा को हंसा कहा जाता है। इस शरीर से जब यह हंसा निकल जाता है तो शरीर एक ख़ाली तस्वीर ही बन कर रह जाता है। उस शरीर का भी अंतिम संस्कार कर दिया जाता है और जो कभी जीता जागता चलता फिरता शरीर था वह ख़ाली तसवीर ही बन कर रह जाता है।

यह प्राण वायु रूपी ऊर्जा जिसे हंसा कहा जाता है आखिर वह कहां से आता है और कहां चला जाता है इसकी थाह नहीं पाईं जा सकी। आध्यात्मिक चिंतन उपदेश ग्रंथों ने भले ही इसकी विशद व्याख्या की है और इस हंसा या आत्मा का अस्तित्व जन्म से पहले और मृत्यु के बाद तक बताया लेकिन सार्वजनिक रूप से किसी की भी मृत शरीर की आत्मा को उस शरीर के जैसा प्रकट नहीं करा पाया जैसा वह मृत्यु से पहले था। इसलिए हंसा निकल जाता है तो फिर खाली तस्वीर हीं उस शरीर नामधारी की रह जाती है।

हंसा निकल जाता है तो फिर ख़ाली तस्वीरों को देखते रहो। उन्हें याद करते रहो, आखों से आंसू बहाते रहो या फिर किसी को ज्यादा नफ़रत थी तो वह उन तस्वीरों को देख देखकर या उसका नाम ले लेकर कोसते रहो या बुरा भला कहते रहो तो भी ख़ाली तस्वीर मौन ही रहती है। धर्म और विज्ञान कोई भी इस हंस को रोक नहीं पाया और इसलिए सभी ने मृत शरीर को सम्मान के साथ इस संसार से विदा कर दिया।

धर्म ने इस प्राण वायु रूपी ऊर्जा अर्थात आत्मा का विशद अध्ययन, ध्यान, चिंतन, मनन आदि कर आत्मा की शांति के लिए कई मार्ग सुझाए जिसमें तर्पण, हवन, अनुष्ठान, श्राद्ध आदि शामिल हैं। इस विषय पर विश्वास रखने वाले लोगों ने धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ही श्राद्ध कर्म को करना शुरू किया और आत्मा की शांति के लिए शास्त्रीय मान्यताओं को माना तथा सदियों से आज तक मान रहे हैं। हिन्दु धर्म में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष के श्राद्ध भी इन्हीं मान्यताओं से जुड़े हुए हैं। पूर्ण रूप से विज्ञान पर विश्वास रखने वालों ने इन सभी मान्यताओं को नहीं माना।

संतजन कहते हैं कि हे मानव, हंसा निकल जाने के बाद वह लौटकर कभी नहीं आया चाहे कैसे भी कितने भी प्रयास कर लिए गए। आत्मा अजर अमर अविनाशी है इस सिद्धान्त को मानकर आध्यात्म ने इस आत्मा को सम्मान दिया तथा इसकी शांति के लिए विभिन्न मार्ग बतलाए। मृत व्यक्ति की स्मृतियां बनी रहे इस कारण भी दान पुण्य तर्पण और श्राद्ध तब जन कल्याण के कार्य उनके नाम से किए जाते हैं।

मानवता के मूल्यों को बनाए रखने के लिए संतों, महापुरुषों ने मानव को संदेश दिए कि हे मानव यह मानव जीवन व्यर्थ में मत गवां। इस दुनिया में आया तो तू हंस की चाल चल, क्योकि बुगले की चाल में छल होता है। मीठी मधुर वाणी बोल कौए की वाणी छोड। सत्य की संगत कर असत्य का त्याग कर।

इसलिए हे मानव, यह हंसा एक दिन शरीर से निकल जाएगा इसलिए तू परमात्मा से डर जो अदृश्य शक्ति का अदृश्य देव हैं ताकि तू सही मार्ग पर गमन कर सके और जीवित आत्मा का ही नहीं वरन मृत आत्मा का भी सम्मान कर सके क्यो कि एक दिन तेरी तस्वीर भी ख़ाली पडी रह जाएंगी और हंसा काया से निकल जाएगा।

सौजन्य : ज्योतिषाचार्य भंवरलाल, जोगणियाधाम पुष्कर