इबादत की रौशनी में गुनाहों का माफीनामा

सबगुरु न्यूज। आध्यात्मिक दर्शन सदा ही इस सोच पर चिंतन मनन करता है कि इस प्रकृति का कोई मालिक जरूर है जो इस की देखभाल करता है तथा उसकी इच्छा के अनुसार ही प्रकृति अपना काम करती है। प्रकृति को नियंत्रित रखने वाला कहीं नजर नहीं आता लेकिन प्रकृति में कब क्या होना है इस बात का भी निर्णय भी उसी के पास सुरक्षित हैं।

आध्यात्मिक चिंतन और दर्शन सदा उसकी खोज में लगे रहते हैं। आध्यात्मिक चिंतन का यह मार्ग क्या उस परमात्मा तक पहुंच जाता है या नहीं जो इस सम्पूर्ण कायनात का मालिक है। जमीनी स्तर पर इस सवाल का जवाब मिलना मुश्किल होता है। अगर मार्ग पहुंच भी जाता है तो चिंतक केवल उसे निहार कर ही रह जाता है। उस कायनात के मालिक को वह अपने अनुसार कार्य नहीं करवा सकता है अन्यथा इस धरती पर वह या तो प्रकोप खुद करवा देता या फिर कभी धरती पर प्रकोप होने ही नहीं देता।

आध्यात्मिक दर्शन, चिंतन सूर्य के अपनी धुरी पर भ्रमण करते हुए तथा पृथ्वी का उसकी परिक्रमा करते हुए ऋतु चक्र के परिवर्तन तथा एक परिक्रमा खत्म होने के बाद दूसरी परिक्रमा शुरू होने के काल को नववर्ष मानते हुए यह बताते हैं कि बीते वर्ष की अंतिम रात्रि में परमात्मा जगत में हुए कार्यो का लेखा जोखा करता है और अगला वर्ष कैसा होगा यह तय करता है।

आध्यात्मिक चिंतन में यही रात्रि इबादत उपासना की महारात्रि मानी गई है। इसी रात मानव अंधेरों में सृष्टि के उस मालिक की इबादत करतां है और अपने सारे गुहानों का माफीनामा लिख देता है जो अंजाने में या जानबूझ कर किए लेकिन इंसानी कानून में सबूतों के अभाव में जो गुनाह नहीं माने गए हैं या उन गुनाह को मानवीय हितों के अनुकूल इंसानी कानून ने मान लिए हों तो ऐसे सारे गुनाह इस जगत का मालिक माफ कर देता है और घर में बरकत समृद्धि का आशीर्वाद देता है। अगले नए वर्ष में उसे क्या करना है वह उसी रात तय कर लेता है।

संत जन कहते हैं कि हे मानव, इबादत, पूजा, अर्चना और ध्यान की इसी रौशनी में सब गुनाह माफ़ हो जाते हैं और इससे समस्त जीवात्मा को बरकत तथा मृत आत्मा को शांति मिल जाती है। आध्यात्मिक चिंतन और दर्शन की यह मान्यता सदा से ही चली आ रही है और मानव को यही समझाईश करती आ रही है कि हे मानव तू जगत के उस मालिक से डर। तू बलवान होकर भले कुछ भी गुनाह करेगा तो भी उसे उचित करार देकर उस गुनाह को दफन कर देगा और अपनी हर सोच को परमात्मा की सोच ही सिद्ध करता रहेगा।

इसलिए हे मानव, तू हर कर्म को अपने स्वार्थ वश उचित मत ठहरा और प्रकृति के न्याय सिद्धांतों के अनुसार ही कार्य करेगा तो गुनाह नहीं कर पाएगा। इबादत की रौशनियों से गुनाहों की माफी नहीं मिलती और ना ही वे कायनात का मालिक तुझे बरकत दे सकेगा। तेरी फ़ितरत में इंसानियत ही तुझे गुनाहों से दूर रखेगी और तुझे बरकत दे सकेंगी।

सौजन्य : ज्योतिषाचार्य भंवरलाल, जोगणियाधाम पुष्कर