बौखलाहट ना थी सूरज को बादलों के अस्तित्व से

सबगुरु न्यूज। सूरज की योग्यता का भान तो उसके प्रकाश की संस्कृति से ही हो जाता है भले ही बादल उसके कितने भी हिस्से पर कब्जा कर ले। घने व गहरे बादल भले ही उसे ढक ले तो भी उसमे बौखलाहट नहीं होती ओर ना ही वह खुद बादल के अस्तित्व को कोसता है। उसका लक्ष्य केवल अपनी मंजिल की ओर जाने का ही होता है।

बादलों की संस्कृति भी बैखोफ होकर सूरज की रोशनी को ढंकने नहीं वरन् अपने अस्तित्व को प्रकट करने के लिए आसमान पर छा जाती है और हवाएं उनके मार्ग को आसान बना देतीं हैं। यश रूपी चांद जब बादलों के आगोश में खो जाता है तो तिलमिला कर बादलों की ओट से बाहर निकलने के लिए हवाओं का आगाज करता है और हवाएं बादलों से टकरा कर उनके जल को बरसा देतीं हैं और बादलों के जल से लोक कल्याण करा देतीं हैं।

बादल भी मुस्करा जाते हैं और कहते हैं कि हे जगत के स्वामी सूर्य व चन्द्र तुमसे तो यह सृष्टि है और तुम ही सशक्त, ज्ञानवान, गुणगान और बलवान हो। तुम ही जगत को जला देते हो तुम ही समुद्र में ऊफान ला देते हो। तुम्हारे इस कर्म से हम बादल बन जाते हैं और अपनी हवाओं के बलभूते हमारा रूप परिवर्तन कर तुम हमे ठुकरा कर जमीन पर बरसा देते हो।

जल बनकर फिर भी हम जगत को जीवन दान देते हैं और जगत में फैली गंदगी को हम बहा देते हैं। हे जगत के चांद सितारों, यह जगत केवल तुम्हारे ही अस्तित्व से नहीं चलता और ग्रहण के समय तुम धराशायी हो जाते हो तो भी जगत चलायमान होता है। इस प्रकृति ने अपनी व्यवस्था दी है और हम सब इससे ही उत्पन्न हुए है अपने अपने गुणों के साथ।

सूरज मुस्कुराते हुए बोला हे बादलों हम सब एक है ये चंद्र तो चंचल मन का है और इसे चिंता हैं कि इसका यश कोई बादल छीन ना ले। सदियों से इसका गुण धर्म यही है और यह हमेशा ऐसे की करता रहेगा। हम सब एक परिवार है और मैं तुम्हारा मुखिया हूं इसलिए तू शान से अपना कार्य करता रह ओर जगत का कल्याण कर।

संत जन कहते हैं कि ये मानव तू निर्भय हो कर जी और अपने कर्म को अंजाम दे। भाग्य का निर्माण इस जगत में कर्म ही करता है और इस कर्म का फल प्रकृति स्वयं प्रदान करतीं हैं।इसलिए हे मानव तेरी योग्यता की परख दुनिया के मापदंड से नहीं केवल ओर केवल तेरे व्यवहार से ही आंकी जाएगी और वह ही आईना तेरी हकीकत का बयान करेगा।

सौजन्य : भंवरलाल