आस्था की मूरत मजबूत और अविश्वास का टूटा घर

सबगुरु न्यूज। आस्था की मूरत सदा मज़बूत रहतीं हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी उसके रंग में निखार आता ही रहता है चाहें कोई भी उस मूरत को किसी भी रंग से क्यों न रंग दे। आस्थावान को उसमें अपना ही रंग दिखता है।

जबकि अविश्वास की मूरत पर भले ही सोने, चांदी, हीरे, मोती व रत्नों के श्रृंगार भले ही कर दिए जाएं पर उसमें सदा ही अविश्वास बना रहेगा क्योंकि आस्थावान की आस्था इनमें नहीं रहती और आस्थावान इनके घर को छोड़ जाते हैं।

आस्था व अविश्वास की सदियों से आज यही कहानी जिन्दा है और अंतिम रूप से आस्था की मूरत पर यही कहा जाता है कि ‘हमें यार की यारी से मतलब है और उसके फेल से हमें क्या लेना देना।’ इसलिए आस्था की वह मूरत भले ही कीचड़ से लेप दी जाए तब भी उसमें विश्वास बना रहता है जबकि अविश्वास पर भले ही चन्दन का लेप कर दें तब भी उस अविश्वास से खुशबू नहीं आती और अविश्वास जीते जी हर ऐश आराम करके भी हर पल नीचा दिखा कर नैतिक पतन करता रहता है।

आस्थाएं लांछन से कभी भी कहीं भी कमज़ोर नहीं हुई और उपाधि व अंलकार से अविश्वास कभी भी मजबूत नहीं बना। समाज की हर व्यवस्था अपने नियम, कानून कायदे, आचार विचार, व्यवहार, रीति रिवाज और उपदेशों से आज तक नहीं बदल सकी।

आस्था और अविश्वास दोनों ही सामाजिक तथ्य है और ये दोनों सदा बने रहेंगे। किसी भी साधन से इन दोनों को तोडा नहीं जा सकता भले ही किसी भी माध्यम से हर पल ओर बार इन पर चाहे जितनी भी भड़ास निकाल कर खुश हो जाएण् ये अपना अस्तित्व बनाए रखते हैं।

संत जन कहते हैं कि हे मानव ये बदले समय का जवाब किसी भी तरह लाजबाब “जबाब” नहीं है और ना ही समय किसी सवाल का जवाब देता है, ये तो कर्म के सागर है जो हर दिन मूरत को पूजने के बाद भी आस्था से उसे जल में विसर्जित कर देते हैं और आनंद का भान कर उत्सव बना फिर अपने ही दिल में बसा लेते हैं।

मूरत मिट जाती है तो भी आस्थाएं सदा जीवित रहतीं हैं और अविश्वास सदा दर दर भटक कर भी अपने ऊपर आन्तरिक विश्वास जमा नहीं पाता। इसलिए हे मानव तू कर्म के मार्ग पर बढ तेरे हर बन्धन इस दुनिया के सामने ही खत्म हो जाएंगे। समय भी तूझे देख कर हैरान हो जाएगा।

सौजन्य : भंवरलाल