वो भूल कर भी याद आता है

सबगुरु न्यूज। सदियों से आने वाला कल, एक बीता हुआ कल बन कर रह जाता है ओर यह बीता हुआ कल आने वाले कल के लिए एक मील का पत्थर बन कर उसे राह दिखा कर मौन हो जाता है और उस मौन में इतिहास की उस झांकी के दर्शन कराता है जहां सभ्यता और संस्कृति में एक रूहानियत का अहसास होता था। दैव दानव व मानव सभी उस परम पिता परमेश्वर के समक्ष नतमस्तक होते थे। जहां अभौतिक संस्कृति के गुणों को जीवन मे उतारा जाता था ओर प्रकृति के हर काल का उसी के अनुसार व्यवहार किया जाता था।

जिस संस्कृति मे प्रेम त्याग तपस्या थी। नारी को एक लक्ष्मी जैसा सम्मान दिया जाता था तथा अतिथि देवो भव के रूप में माना जाता था। जहां नदियां वर्ष भर बहकर सभ्यता और संस्कृति की पोषक बनी हुई थी। ऋतुजनित फल, फसल और वनस्पति अपनी प्रचुर मात्रा में उत्पन्न हो कर जीव व जगत के लिए सुलभ हो जातीं थी।

जहां राजा और शासक को एक भगवान के अंश के रूप में देखा जाता था। वही पालनकर्ता व न्यायकर्ता की भूमिका निभाता था। न्याय की मिसाल सार्वभौमिक बन कर जनता में विश्वास को जगाती थीं। राज्य की किसी भी नीति से प्रजा को परेशानी न हो इस बात का ध्यान राजा स्वयं रखता था। कला संगीत साहित्य विज्ञान और शिक्षा को एक विशेष लक्ष्य मान कर ही उनको संरक्षण दिया जाता था।

राजा हरिश्चंद्र ने समाज और संस्कृति में मानवीय मूल्यों को स्थापित कर अपने धर्म, कर्म, सत्य, अहिंसा, त्याग का एक अनूठा योगदान देकर विद्वानों के प्रति आदर और प्रजा के लिए विश्वास पैदा कर राज्य त्याग दिया। उसकी पत्नी व पुत्र ने रिश्तों की गरिमा को बनाए रखा। सभी ने सेवक बनकर अपने दायित्वों को निभाते हुए आदर्श कर्म के आयाम स्थापित किए।

सभ्यता और संस्कृति की यह रूहानियत शनैः शनैः लोप होतीं रही, भले ही इसका कारण मानव स्वयं बना या फिर विदेशी आक्रान्ता बने। सभ्यता और संस्कृति स्वार्थ मनमानी नीतियों के हत्थे चढ़ गई और अभौतिक संस्कृति को ठुकराते हुए मानव ने भौतिक संस्कृति को ही भगवान मान उसे खूब पूजवाया।

लेकिन पूजा के उन फूलों में कला, संगीत, साहित्य, विज्ञान और धार्मिक सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और मानव मूल्यों की खुशबू ना थी। इन सब को एक नया जामा पहनाता हुआ कल हर बार इसकी सात्विकता भंग करता हुआ इनकी सुंदर रूहानियत को खो बैठा।

विश्व स्तर पर बढ़ती वैमनस्यता और आंतकवाद मानवीय मूल्यों का दफन होकर एक ऐसी संस्कृति का निर्माण हो रहा है जहां पर भुखमरी, महिलाओं व बालिकाओं के साथ बढ़ते जुल्म, बुजुर्ग व बेसहारा लोगों की अनदेखी कर केवल अपने आप को शक्तिशाली बनाने और मनमानी करने की होड़ मची हुई है।

आज विश्व की उन प्रचीन सभ्यता और संस्कृति की रूहानियत याद आतीं हैं जहां का मानव भी मानवता के मूल्यो को अपनाते हुए भी विकास और विज्ञान के चरम पर था। उस काल की कला संगीत साहित्य विज्ञान और धार्मिक सामाजिक आर्थिक राजनैतिक मूल्यों को आज का विज्ञान छू भी न सका। उस संस्कृति को अंधविश्वास का नाम देने लगा जहां का मानव पृथ्वी के बाहर के ग्रहों मंगल ग्रह आदि पर सहज ही आ जाता था।

सौजन्य : भंवरलाल