ऐंठ मत राखे बावला, फिर पाछे पछताय

सबगुरु न्यूज। रस्सी का बल उसकी ऐंठन में ही होता है और उसी ऐंठन के बलबूते वह अपने अस्तित्व को बनाए रखती है। जल जाने के बाद वह भले ही मिट्टी बन जाए तब भी अवशेष के रूप में अपने गुणों को छोड़ जाती है।

यह ऐंठन जब मानव के गुणों में होती है तो वह सुख नहीं पाता और कई अभावों से उसे ग्रस्त रहना पड़ता है। ऐंठन में एक अनावश्यक अकड़ होती है जो बुद्धि पर भारी पड़ती हैं। हर सुविधाओं के उपलब्ध होने के बावजूद भी वह उन्हें नहीं स्वीकारता और अनावश्यक दुख उसे हिस्से में आते हैं।

इस ऐंठन को कई बार वह अपना सिद्धांत बना बैठता है। अभावों से पीड़ित होने पर दुख पाता रहता है लेकिन ऐंठन की बादशाहत को बरकरार रखता है। ऐंठन भी अपने गुणों में सदाबहार होती है। चाहे दिन का राजा हो या रात की रानी। ऐंठन का इतिहास भी कुछ ऐसा ही रहा है ना तो वो गई और ना ही जाएगी। वह टूट गई या तोड दी गई लेकिन अपने इरादों के प्रति वफादार ही रही।

एक छोटा बालक जब ऐठ में आ जाता है तो वह खाने पीने के लिए मना कर देता है। कुछ देर बाद उसे भूख ज्यादा लगती हैं तो वह इधर उधर सामान पटकने लगता है। गुस्से में चिल्लाने और रोने लग जाए। तब मां उसे कहती है कि बेटा ऐसे मत कर, खाना खा ले। बच्चा चुपचाप खाना खाने लग जाता है। बड़े व्यक्ति में यह ऐठ थोड़ी ज्यादा होगी। ऐठ का आखिरी नतीजा केवल मात्र समर्पण ही होता है।

समय, जब ऐंठ पर प्रहार करता तो ऐंठ दबे पांव भाग जाती है। चाहे वह अमीर हो या गरीब।स्त्री हो या पुरुष। पति-पत्नी हो या बच्चे या कोई ऊंचा हो अथवा नीचा, राजा हो या रंक।

संत जन कहते हैं कि हे मानव ऐंठ की उम्र छोटी होती है और उससे सदा हानि ही होती है। थोड़ी सी ऐंठ जीवन में मिलनें वाले महत्वपूर्ण अवसर को गंवा बैठती है और मानव हठधर्मी हो कर अनावश्यक रूप से अभावों से ग्रसित हो जाता है। कई बार इसी ऐंठ में वह अपना सब कुछ खो बैठता है और बाद मे पछताया करता है।

इसलिए हे मानव तू समाजिक रिश्तों को जीवित रखने के लिए अपनी ऐंठ को दफ़न कर और संबन्धों में एक मिठास बनाए रख ताकि भविष्य में रिश्ते टूटने पर आंसू ना बहाने पडे।

सौजन्य : भंवरलाल