महिनों फागुण को नन्द लाला थारी याद…

सबगुरु न्यूज। जाता हुआ बसंत और आती गर्मी प्रकृति में प्रेम की गुलाल उछाल कर प्राणियों को अति रोमांचित कर देती है, प्राणी प्रेम रस में भीगकर प्रेम की सीमा को पार करने को अति उत्तेजित हो जाता है और मिलन की हसरत के लिए आगे बढ़ जाता है।

प्रेमी हद को पार करते हुए फाल्गुन मास मे रंगीन बन जाते हैं। वे रंगीन वस्त्र और सुगंध से श्रृंगार कर रती और कामदेव बन काम बाणों से आहत होकर मिल जाते हैं।

काम, क्रोध और वासना इस मास में बढ जाती है तो इस काम, क्रोध को भस्म करने और कामदेव को जलाने के लिए प्रकृति शिव के तीसरे नेत्र को खोलकर उसे भस्म कर देती है और प्राणी होली का पर्व मनाकर बैर बदले की भावना को छोड़ दिल से दिल मिला लेते हैं, प्रेम उमंगें एक अमर प्रेम की दास्तान छोड़ जाते हैं।

प्रेम की भक्ति का महिना होता है फाल्गुन मास। यह मास प्रेम के भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन का प्यासा बनकर हर पल उसे याद करते हुए नाचता है, गाता है और शोर मचाता है। रास में चंग की थाप पर रास लीला करते राधा और कृष्ण की अदभुत लीलाओं को याद करते हुए होली की गैर खेलने लग जाता है, खाने पीने की सुध बुध भूल वह प्रेम रस पीता हुआ मस्त हो जाता है।

संत जन कहते हैं कि हे मानव फाल्गुन प्रेम की दुनिया का बेमिसाल मास होता है और प्राणियों को रोमांचित कर देता है। कहता है कि हे मानव तू बेर विरोध और नफ़रत की भावना को त्याग दे। प्रेम की उस दासता को लिख जिससे आने वाले कल में तेरे विश्वास का रंग सभी पर चढा रहे और सब एक होकर विकास को जमीनी हकीकत पर उतारते हुए प्रसन्न हो जाएं।

इसलिए हे मानव तू प्रेम की चादर को कच्चे रंगों से मत रंग, नहीं तो यह रंग उतर जाएगा और तू मानव प्रेमी नहीं फरेबी कहलाएगा। तेरा बनावटी प्रेमजाल बिखर जाएगा। तू गुमराह मत हो और तेरे काम, क्रोध, लोभ, लालच और अंहकार की आहुति इस फाल्गुन मास की होली में डाल। तू सफ़ल साधक बन जाएगा और लोक कल्याणकारी बनकर दुनिया के भूकंप को रोक पाएगा।

सौजन्य : भंवरलाल