नाम लेते ही प्रभु का अहसास : हित अम्बरीश महाराज

अजमेर। दीपक जलाते ही जिस तरह प्रकाश फैल जाता है वैसे ही संतों की शरण में आते ही प्रभु भक्ति का भाव जग जाता है। संत का एक वाक्य ही जीवन में बदलाव ला देता है। मन अभिमान छोड कर ही संतों की शरण में जाएं तो जीवन में अनोखा परिवर्तन पाएंगे। यह बात श्री हित ​हरिवंश चंद महाप्रभु एवं राधावल्लभ लालजी के लाडले संत श्री हित अम्बरीश महाराज ने आजाद पार्क अयोध्या नगरी में 54 अरब ​हस्तलिखत श्रीराम नाम परिक्रमा महोत्सव के दौरान प्रवचन करते हुए कही।

उन्होंने कहा कि इस संसार में आया हर जीव जानता है कि खाली हाथ आए हैं खाली जाएंगे इसके बाद भी संसार में उलझा रहता है। पाप बढ जाता है तो कथा में मन नहीं लगता। इसलिए सत्संग का अवसर कभी न चूकें। गोस्वामी ने कहा है कि जीव कर्म के बंधन में बंधा है। खूब गुणा भाग करके संपति को अर्जित करना जानता है। विषयों का जानकार होना और ज्ञान का प्रकाश जीवन में फैलना दोनों अलग बात है। मनुष्य पुरुषार्थ और सामर्थ से बहुत कुछ पा सकता है। भगवान भी उसे सब कुछ देते हैं, लेकिन वे भक्ति सहजता से नहीं देते। भक्ति पाना दुलर्भ है। सत्संग से प्रीत करें तो तो संसार के प्रति लगाव खुद ब खुद कम हो जाएगा। संतगण प्रभु से प्रीत करने की रीत सिखाते हैं।

उन्होंने कहा कि प्रभु भक्ति बिना मन के अभाव की पूर्ति नहीं हो सकती। धन तो लोभ लेकर आता है, लोभ के पास विचार करने का सामर्थ नहीं होता तो धन से मन के अभाव की पूर्ति कैसे होगी। जीवन में सत्संग ही ऐसा जरिया है जिससे भगवत मार्ग का रास्ता पता चलता है। सत्संग अनियंत्रित मन को काबू करने की युक्ति है। जब भी संत मिलन हो या सत्संग का अवसर मिले तो हमेशा यह मानो मैं यहां खुद नहीं आया, प्रभु ने मुझे भेजा है, क्योंकि प्रभु की स्वीकृति के बिना कोई जीव सत्संग में नहीं आ सकता।

उन्होंने कहा कि संत बिना युक्ति नहीं और सत्संग बिना मुक्ति नहीं। संत के पास एक ही संपति होती है वह है भगवान की भक्ति। संत ही भगवान से प्रीत लगाने का रास्ता बताता है। जिस तरह गंगा में एक लोटा पानी मिला तो तो वह गंगा में मिल जाता है इसी तरह ठाकुरजी से मन रमा तो फिर उन्हीं का हो जाता है। मनुष्य जीवन मिलना बहुत बडी उपलब्धि है क्योंकि मानव जीवन प्रभु को पाने का सरल साधन है।

जीवन में परमानंनद तब होता है जब भगवतभाव हदय के भीतर प्रकट हो। मन के भीतर देखों, अन्तर्ममुखी बनो तो लगेगा ईश्वर तो भीतर है। राम नाम जीभ पर आ जाए तो भीतर भी प्रकाश फैल जाता है। ये नाम मन के मैले दर्पण को स्वच्छ कर देता है। जीवन में सत्संग सदैव रहे। संत भगवतभाव देता है। जीवन में सतत सत्संग हो तो जीवन सफल हो जाता है। सत्संग विचार शक्ति और विवेक को बढाता है। सत्संग ही सत्य और असत्य का बोध कराता है।

शब्द में अदभुत शक्ति होती है, इसमें वस्तु का साक्षात्कार कराने की शक्ति होती है। इसी तरह शब्द रूपी राम नाम लेते हैं तो प्रभु राम का अहसास हो जाता है। नाम की महिमा देखिए कि जिस सागर को बिना सेतु के भगवान राम न लांघ सके उस सेतु को भक्त हनुमान भगवान का नाम स्मरण कर लांघ गए। इसलिए भगवत नाम का उच्चारण करें, निष्काम भाव से नाम जपे, उससे आप में सात्विकता का संचार होता है। नाम जप मन में सदभाव भरेगा।

जब कभी मन दुखी हो तो भगवान की मुस्कान के दर्शन करें। इतना कर लेने भर से जीव अपने कष्ट भूल जाएगा। व्यस्त होना जीवन की उपलब्धि नहीं बल्कि मस्त होना उपलब्धि है। जीवन में प्रभु नाम की मस्ती होनी चाहिए। सुख और दुख कभी वस्तु से नहीं मन की स्थिति से होता है। जिसके हदय में भगवान का वास हो वह तो सदैव परमानंद में होता है। जब तक चिंता है तब तक द्वंद है। जिनकी कोई चाह नहीं वहीं शहंशाह है।