आईडिया ऑफ इंडिया-4: मामूली मरम्मत की ही अनुमति है तो लिमबड़ी कोठी में इतनी निर्माण सामग्री कैसे?

माउंट आबू में लिमबड़ी कोठी में डंपर भरकर आती निर्माण सामग्री।
माउंट आबू में लिमबड़ी कोठी में डंपर भरकर आती निर्माण सामग्री।

सबगुरु न्यूज-सिरोही। कायदों से बंधे होने की दलील देकर माउंट आबू के उपखण्ड अधिकारियों और नगर पालिका ने कैसे अपने फायदे के लिए हर काम किये इसका सबसे परफेक्ट उदाहरण है लिमबड़ी कोठी।

एक उदाहरण मंगलवार को सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे उस पत्र में भी वहां के अधिकारी का नाम आया है कि अपने मित्र की होटल के लिए बेतहाशा निर्माण सामग्री उपलब्ध करवाई। उपखण्ड अधिकारी और नगर परिषद मामूली मरम्मत की अनुमति दिए जाने का अधिकार होने की दुहाई देते हुए किस तरह सम्पन्न लोगों को नए निर्माण और पुनर्निर्माण के लिए मुक्त हस्त के निर्माण सामग्री लुटाते रहे इसका उदाहरण है लिमबड़ी कोठी।

ये अपने आपमें सुप्रीम कोर्ट व पर्यावरण मंत्रालय द्वारा स्थानीय आम आदमी की सहूलियत के लिए दी गई रियायतों का नेता पुत्रों और अधिकरियों के करीबियों को नवाजने के स्कैम से कम नहीं है।
-कोर्ट के नाम पर आम आदमी को अटकाया
माउंट आबू के स्थानीय सामान्य लोग जब अपनी जर्जर भवनों को रहने लायक या व्यवसाय के लायक बनाने के लिए नगर पालिका और उपखण्ड अधिकारियों की शरण में जाते तो कई अधिकारी उन्हें सिर्फ मामूली मरम्मत की अनुमति देने की दुहाई देकर राहत से इनकार कर देते।

लेकिन लिमबड़ी कोठी को मामूली मरम्मत के अधिकार के दौरान सैंकड़ों ट्रक ईंट, बजरी और सरियों के जारी हुए। मोनिटरिंग कमेटी की पहली बैठक म3न लिए गए निर्णय के अनुसार जबकि ये तभी जारी किए जा सकते थे जब जोनल मास्टर प्लान के तहत बिलिडिंग बायलॉज लागू हो जाते।

क्योंकि बिल्डिंग बायलॉज तो खुद इन उपखण्ड अधिकारियों ने कार्यवाहक आयुक्त का चार्ज रहते हुए लागू नहीं होने दिए ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की सीधी सीधी अव्हेलनाएँ उपखण्ड अधिकारी कार्यालयों से होती रही।
-इस पत्र ने खोली आयुक्त की पोल
एनजीटी में एक वाद दायर हुआ है। जिसके तहत ये दलील दी है कि सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी की मंशा व जोनल मस्टर प्लान के विपरीत जून 2009 के निटिफिकेशन के बाद माउंट आबू में कृषि भूमि पर बिना कन्वर्जन के अवैध निर्माण हुए हैं। इसके बाद प्रशासन ने इन सबको नोटिस जारी किए हैं।

इसके बाद माउंट आबू उपखण्ड अधिकारी से महेंद्र कुमार पुत्र कालूराम ने एक शिकायत दर्ज करवाई है। इसमें करीब 16 सम्पत्तियों के नाम और अन्य 50 प्रोपर्टियो के एग्रीकल्चर भूमि और होते हुए निर्माण होने की शिकायत की है। सवाल ये है कि जब सामग्री जारी करने का सारा अधिकार उपखण्ड अधिकारियों के पास है तो फिर एग्रीकल्चर लेंड और सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करके बनाये गए भवनों को निर्माण सामग्री जारी कैसे कर दी गई।

इसी पत्र में माउंट आबू के लोगों के फोन नहीं उठाने के लिए स्थानांतरित हुए आयुक्त पर भी गम्भीर आरोप लगाए हैं। इन पर ओरिया में कृषि भूमि पर अपने मित्र की होटल का निर्माण करवाने लोकडाउन में निर्माण करवाने का आरोप लगा है। उपखण्ड अधिकारी को इन सब पर कार्रवाई नहीं करने पर एनजीटी में जाने की भी बात कही गई है।

ऐसे में अब माउंट आबू के लोगों के हकों को दबाकर माउंट आबू के अधिकारियों द्वारा अपने हितों के अनुसार ईको सेंसेटिव जोन के कायदों की विवेचना करना अब इन अधिकारियों पर ही भारी पड़ता जा रहा है। सिर्फ लिमबड़ी कोठी का प्रकरण ही अगर चुनौती दे दिया जाए तो माउंट आबू के आम लोगों का हित नहीं होने देने के।लिए बिल्डिंग बायलॉज को अटकाने वाले कई अधिकारियों पर आफत आ जायेगी।
-शांति धारीवाल की चिंता की भी पालना कहाँ?
1 मार्च 2019 को विधानसभा में संयम लोढ़ा द्वारा निर्माण सामग्री पर टोकन व्यवस्था खत्म करने की बात कही थी तोयूडीएच मंत्री शांतिधारीवाल ने इस व्यवस्था को पनपाने के लिये पर्यावरण को बचाने की जो चिंता जताई थी उन सारी चिंताओं को टोकन प्रणाली के माध्यम से बेतहाशा निर्माण सामग्री एकत्रित करने में लिमबड़ी कोठी प्रकरण में चिता पर लेटा दिया गया है।

यहाँ बने सीमेंटेड पिलर्स, बीम्स, आरसीसी और नया निर्माण इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि मरम्मत के।लिए निर्माण सामग्री जारी करने के नाम और नए निर्माण होने की बात कहकर शांति धारीवाल ने संयम लोढ़ा की टोकन व्यवस्था बन्द करने की मांग को दरकिनार करने की जो कोशिश की थी, उन सब दावों को टोकन व्यवस्था के तहत ही ठेंगा दिखा दिया गया।

माउंट आबू के वर्तमान उपखण्ड अधिकारी ने आते ही पूर्व उपखण्ड अधिकारियों द्वारा जारी निर्माण सामग्रियों के टोकन रोक दिए। दलील थी कि वो इस बात की तस्दीक करना चाहते हैं कि स्थानीय लोगों के वैध पट्टे वाले मकान में टूट फुट की सुधार के लिए उतनी ही निर्माण सामग्री जारी की है है जितनी जरूरी है या उससे ज्यादा जारी की है। तो सवाल ये है कि क्या ऐसी ही तस्दीक लिमबड़ी कोठी की निर्माण सामग्री की भी की गई थी या नहीं और कि गई थी तो बिना बिल्डिंग बायलॉज लागू हुए लिमबड़ी कोठी में निर्धारित मालों के ऊपर तक आरसीसी पिलर्स कैसे बन गए?