कंगना रनौत लाई महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल

विनीत शर्मा
सबगुरु न्यूज। बात निकलेगी तो दूर तक जाएगी। यहां तो बात निकल चुकी है, किसी को अंदाजा भी नहीं कि अब कितनी दूर तक जा चुकी है और अभी कितना दूर तलक और जाएगी। इस बात की थोड़ी बहुत राह समझ आई है तो वह हैं शरद पवार। पुराने चावल को पता होता है कि बासमती की महक कितनी दूर तक जाती है।

दिनोंदिन अपने विस्तार को और विस्तृत कर रही भाजपा को महाराष्ट्र ने बैठे बिठाए एक मौका हाथ दे दिया। मुम्बई में मणिकर्णिका घ्वंस आने वाले दिनों में शिवसेना से ज्यादा कांग्रेस की उम्मीदों के विध्वंस की वजह अधिक बनता दिख रहा है। इसकी वजह है महाराष्ट्र की सत्ता में हुए बंदरबांट में कांग्रेस की हिस्सेदारी।

सुशांत की आत्महत्या का जिन्न बिहार में चुनाव की जमीन तैयार कर चुका है। पूरे मामले में बढ़त फिलहाल एडीए के हाथ है। शिवसेना के संजय राउत में जरा भी समझ होती तो इस मामले को महाराष्ट्र तक ही सीमित रख लेते। मामला यहीं थम जाता। उन्होंने अपने बड़बोलेपन के कारण सुशांत मामले पर बिहार में बंटे जनाधार को अनायास ही एनडीए की तरफ लामबंद कर दिया।

पहले सुशांत के परिवार के बारे में अनर्गल बोलकर और फिर बिहार पुलिस के साथ मुम्बई में हुई हरकतों ने सुशांत मामले में लालू-कांग्रेस गठजोड़ को बैकफुट पर ला दिया है। संजय राउत और मुम्बई पुलिस की हड़बड़ी ने देशभर में एक ही संदेश दिया कि सुशांत मामले में कुछ तो ऐसा है, जिसकी आंच महाराष्ट्र सरकार तक जाती है।

आदित्य ठाकरे की इस मामले में भले कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष संलिप्तता न हो, लेकिन मुम्बई पुलिस ने अपनी हरकतों से उसकी गुंजाइश के लिए एक बारीक रास्ता जरूर खोल दिया है। इसके बाद से ठाकरे के लिए हैशटैग बेबी पेंग्विन जिस तेजी से ट्रेंड किया उसने पूरे परिवार की जगहंसाई ज्यादा कराई है।

हिमाचल प्रदेश में दो साल में चुनाव होने हैं। दूसरे कई राज्यों की तरह यहां भी जब से विपक्ष ने सत्ता में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है, हर चुनाव में सत्ता कांग्रेस और भाजपा के बीच पाला बदलती रही है। पहली बार 1977 में शांताकुमार ने बरसों से सत्ता पर काबिज कांग्रेस को बेदखल किया था। उसके बाद से अब तक लगातार सत्ता की डोर भाजपा और कांग्रेस के हाथों में जाती रही है।

फिलवक्त यहां भाजपा सत्ता पर काबिज है और माना जा रहा था कि 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव में सत्ता का रंग बदलेगा। 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव के नजरिए से यह कांग्रेस के लिए बड़ी सहूलियतभरा रहता। संजय के कंगना पर ट्विटर वार और फिर बीएमसी के बहाने कंगना के बंगले पर हुई कार्रवाई ने हिमाचल की राजनीति में भी भूचाल ला दिया है।

कोई भी राजनीतिक दल हाथ आए अवसर नहीं छोड़ता तो भाजपा से यह अपेक्षा बेमानी है। हिमाचल चुनावों में कंगना का सम्मान मुद्दा बन जाए तो हैरानी नहीं चाहिए। हिमाचल के मुख्यमंत्री ने इसके संकेत भी दे दिए हैं। यहां शिवसेना के पास खोने को कुछ नहीं है, लेकिन ऑटो के तीसरे पहिए की संभावनाओं पर ग्रहण लगता दिख रहा है।

हिमाचल प्रदेश की तरह उत्तराखंड में भी सत्ता का बंटवारा इसी तर्ज पर होता आया है। हिमाचल की अस्मिता अगर पहाड़ी अस्मिता में बदल गई तो इस बार देहरादून का सचिवालय भी कांग्रेस के लिए सपने सरीखा हो सकता है। आमतौर पर इस तरह के विवादों की उम्र बहुत छोटी होती है, लेकिन भाजपा राई का पहाड़ बनाने में सबसे आगे है।

इस मुद्दे को भाजपा जितना आगे तक लेकर जाएगी, कांग्रेस को उतना ही नुकसान होगा। पश्चिम बंगाल में दौड़ से लगभग बाहर हो चुकी कांग्रेस के लिए रिया का समर्थन बिहार में उसकी ही नहीं राजद की लुटिया डुबोने की बड़ी वजह बन सकता है। इस डैमेज को तेजस्वी कितना रोक पाते हैं यह देखना दिलचस्प होगा। बिहार चुनाव में कंगना भाजपा की स्टार प्रचारक बन गईं तो इसकी प्रबल संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस का रिया को समर्थन विपक्ष को ले डूबेगा।

शरद पवार जो सत्ता के इस तिपहिए का सबसे अहम चक्का हैं, अगले विधानसभा चुनाव में कंगना का जिन्न उनके लिए भी मुश्किलें खड़ी करने वाला है। यही वजह है कि उन्होंने सबसे पहले अपनी प्रतिक्रिया देते हुए पूरे मामले को गैरजरूरी बताया। इसके बावजूद कंगना के निशाने से नहीं बच पाए। बीएमसी ने जैसे ही कंगना के थार वाले फ्लैट पर भी कार्रवाई का शिगुफा छोड़ा, कंगना ने पवार को लपेटे में ले लिया है।

उन्होंने साफ कर दिया कि जिस इमारत की बात हो रही है, वह शरद पवार के पार्टनर की है। बिहार विधानसभा चुनाव के बाद जब कांग्रेस को समझ आएगा कि उसने क्या कुछ खो दिया है तो संभव है कि महाराष्ट्र की सरकार पर भी संकट के बादल गहराएं। संजय निरुपम समेत कई कांग्रेसी नेता पहले ही दिन से इस गठबंधन के खिलाफ हैं, उन्हें मुखर होने का मौका मिलेगा।

कंगना प्रकरण इतनी जल्दी थमने वाला नहीं है। महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव तक यह मुद्दा बना रहा तो एनसीपी के लिए भी अपनी साख बचाए रख पाना आसान नहीं होगा। बहरहाल यह तय है कि शिवसेना का यह बचपना महाराष्ट्र के बाहर कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती साबित होने जा रहा है।
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