कानपुर गंगा मेला : ठेले पर निकाला जाता है होली का जुलूस

Kanpur People Celebrate Ganga Mela After Holi
Kanpur People Celebrate Ganga Mela After Holi

कानपुर(ganga mela 2018 kanpur)। देश में रंगों के पर्व होली की मस्ती का दौर भले ही थम गया हो मगर उत्तर प्रदेश के औद्योगिक नगर कानपुर में होली की खुमारी गुरूवार को ‘गंगा मेला’ के साथ उतरेगी।

दरअसल, कानपुर में होली खेलने की यह परम्परा देश प्रेम की भावना से प्रेरित है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वर्ष 1942 में हुयी एक घटना से अनुराधा नक्षत्र के दिन होली खेलने की परम्परा की शुरूआत पड़ी जो पिछले आठ दशकों से चली आ रही है। कानपुर में लोग होली के दिन रंग खेले ना खेले मगर अनुराधा नक्षत्र के दिन होली जरूर खेलते हैं।

बरसों से चली आ रही इस परम्परा को हर साल निभाया जाता है। गंगा मेला के दिन यहां भीषण होली होती है। ठेले पर यहां होली का जुलूस निकाला जाता है। ये जुलूूस हटिया बाज़ार से शुरू होकर नयागंज, चौक सर्राफा सहित कानपुर के करीब एक दर्जन पुराने मोहल्ले में घूमता हुआ दोपहर दो बजे तक हटिया के रज्जन बाबू पार्क में आकर खत्म किया जाता है।

इसके बाद शाम को सरसैया घाट पर गंगा मेला का आयोजन किया जाता है। जहां शहर भर के लोग इकठ्ठा होते है और एक दूसरे को होली की बधाई भी देते हैं।

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी 89 वर्षीय रामनाथ अग्रवाल गंगा मेला का महत्व बताते हुए कहते हैं कि गंगा मेला की नींव साल 1942 में पड़ी थी। स्वतंत्रता आंदोलन की आग से थर्राये अंग्रेज हुक्मरानों ने क्रांतिकारियों के गढ़ कानपुर में होली न खेलने की चेतावनी जारी की थी मगर होली के दिन हटिया बाजार में स्थित रज्जन बाबू पार्क में नौजवान क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत की परवाह किए बगैर पहले तिरंगा फहराया, फिर जमकर होली खेली।

इसकी भनक जब अंग्रेजी हुक्मरानों को लग गई जिसके बाद करीब एक दर्जन से भी ज्यादा अंग्रेज सिपाही घोड़े पर सवार होकर आए और झंडा उतारने लगे जिसको लेकर होली खेल रहें नौजवानों के बीच संघर्ष भी हुआ। अंग्रेज हुक्मरानों ने गुलाब चन्द्र सेठ, बुद्धूलाल मेहरोत्रा, नवीन शर्मा, विश्वनाथ टंडन, हमीद खान, गिरिधर शर्मा समेत 40 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया।

क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करना अंग्रेजी हुक्मरानों के लिए गले की हड्डी बन गई। गिरफ्तारी के विरोध में कानपुर का पूरा बाजार बंद हो गया। मजदूर, साहित्यकार, व्यापारी और आम जनता ने जहां अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। वहीं इनके समर्थन में समूचा कानपुर शहर और आसपास के ग्रामीण इलाको का भी बाज़ार बंद हो गया।

मजदूरों ने फैक्ट्री में काम करने से मना कर दिया। ट्रांसपोर्टरों ने चक्का जाम कर सड़कों पर ट्रकों को खड़ा कर दिया। सरकारी कर्मचारी हड़ताल पर चले गए। हटिया बाजार में सौ से ज्यादा घरों में चूल्हा जलना बंद हो गया। मोहल्ले की महिलाएं और छोटे-छोटे बच्चे उसी पार्क में धरने पर बैठ गए।

समूचे शहर की जनता ने अपने चेहरे से रंग नहीं उतारे, यूं ही लोग घूमते रहे। शहर के लोग दिनभर हटिया बाजार में ही इक्कठा हो जाते और पांच बजे के बाद ही लोग अपने घरों में वापस चले जाते। इस आंदोलन की आंच दो दिन में ही दिल्ली तक पहुंच गई। जिसके बाद पंडित नेहरू और गांधी ने इनके आंदोलन का समर्थन कर दिया।

कानपुर शहर में मीले बंद, कोई कारोबार नहीं होने से अंग्रेजी हुक्मरान परेशान हो गया। चौथे ही दिन अंग्रेजो का एक बड़ा अफसर कानपुर पहुंचा। शहर के कुछ प्रतिष्ठित लोगों को बात करने के लिए बुलाया। लोगों ने उसे हटिया बाज़ार के पार्क में आकर बात करने को कहा तो उसने मना कर दिया। आखिरकार उस अंग्रेज अफसर को उस पार्क में आना पड़ा, जहां करीब चार घंटे तक बातचीत चली। उसके बाद सभी क्रांतिकारियों को होली के पांचवे दिन अनुराधा नक्षत्र के दिन रिहा कर दिया गया।

अग्रवाल ने बताया कि अनुराधा नक्षत्र के दिन जब नौजवानों को जेल से रिहा किया जा रहा था। पूरा शहर उनके लेने के लिए जेल के बाहर इकठ्ठा हो गया था। जेल से रिहा हुए क्रांतिवीरों के चहरे पर रंग लगे हुए थे। जेल से रिहा होने के बाद जुलुस पूरा शहर घूमते हुए हटिया बाज़ार में आकर खत्म हुआ। उसके बाद क्रांतिवीरों के रिहाई को लेकर यहां जमकर होली खेली गई।